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भगवान अजितनाथ जी का गर्भ कल्याणक 27 मई को: तिथि के अनुसार ज्येष्ठ अमावस्या के दिन मनाया जाता है गर्भ कल्याणक 


जैन धर्म के द्वितीय तीर्थंकर भगवान अजितनाथ का गर्भ कल्याणक इस वर्ष 27 मई को आ रहा है। तिथि के अनुसार यह ज्येष्ठ अमावस्या के दिन गर्भ कल्याणक मनाया जाता है। इस बार भी दिगंबर जैन मंदिरों, चैत्यालयों में भगवान अजितनाथ जी के गर्भ कल्याणक के अवसर पर विविध विधान, अभिषेक, शांतिधारा आदि किए जाएंगे। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उप संपादक प्रीतम लखवाल की संयोजित और संकलित यह प्रस्तुति…


इंदौर। भगवान अजितनाथ जी का गर्भ कल्याणक जैन धर्म में महत्वपूर्ण कल्याणक है। यह उस दिन को चिह्नित करता है, जब भगवान अजितनाथ जी ने अपनी माता विजया के गर्भ में प्रवेश किया था। यह घटना ज्येष्ठ मास की अमावस्या को हुई थी। यह इस बार 27 मई को आ रही है। जैन धर्म के शास्त्रों के अनुसार रानी विजया को एक अद्भुत स्वप्न हुआ। इसमें उन्होंने एक श्वेत हाथी देखा। इस स्वप्न का अर्थ था कि उन्हें एक तीर्थंकर पुत्र होगा। राजा जितशत्रु जो देशावधिज्ञान से युक्त थे, ने रानी को उनके स्वप्न का फल बताया। उन्होंने कहा कि उनके गर्भ में एक तीर्थंकर अवतरित होने वाला है। गर्भ कल्याणक तीर्थंकर के जीवन के पांच कल्याणकों में से एक है, जो उनके जीवन में महत्वपूर्ण अवसरों को चिह्नित करता है। यह घटना जैन धर्म के अनुयायियों के लिए एक महत्वपूर्ण पर्व है। जिसे वे भक्ति और श्रद्धा से मनाते हैं। इस अवसर पर लोग अजितनाथ भगवान की पूजा करते हैं, अभिषेक करते हैं और उनके दिव्य गुणों का स्मरण करते हैं।

गर्भ में विजय विमान से तीर्थंकर पुत्र अवतीर्ण हुआ

ज्येष्ठ महीने की अमावस को जब रोहिणी नक्षत्र का कला मात्र से अवशिष्ट चंद्रमा के साथ संयोग था। तब ब्रह्म मुहूर्त के पहले महारानी विजयसेना ने चौदह स्वप्न देखे। उस समय उनके नेत्र बाकी बची हुई अल्प निद्रा से कलुषित हो रहे थे। चौदह स्वप्न के बाद उन्होंने देखा कि हमारे मुख कमल में एक मदोन्मत्त हाथी प्रवेश कर रहा है। जब प्रातःकाल हुआ तो महारानी ने जितशत्रु महाराज से स्वप्नों का फल पूछा और देशावधिज्ञान रूपी नेत्र को धारण करने वाले महाराज जितशत्रु ने उनका फल बतलाया कि तुम्हारे स्फटिक के समान निर्मल गर्भ में विजय विमान से तीर्थंकर पुत्र अवतीर्ण हुआ है। वह पुत्र, निर्मल तथा पूर्वभव से साथ आने वाले मति-श्रुत-अवधिज्ञानरूपी तीन नेत्रों से देदीप्यमान है।

मेरू पर्वत पर जन्माभिषेक कल्याणक किया

भगवान् आदिनाथ के मोक्ष चले जाने के बाद जब पचास लाख करोड़ सागर वर्ष बीत चुके तब द्वितीय तीर्थंकर का जन्म हुआ था। इनकी आयु भी इसी अंतराल में सम्मिलित थी। जन्म होते ही सुंदर शरीर के धारक तीर्थंकर भगवान् का देवों ने मेरू पर्वत पर जन्माभिषेक कल्याणक किया और अजितनाथ नाम रखा। भगवान अजितनाथ की 72 लाख पूर्व की आयु थी और 450 धनुष शरीर की ऊँचाई थी। अजितनाथ स्वामी के शरीर का रंग स्वर्ण के समान पीला था। उन्होंने बाह्य और आभ्यंतर के समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली थी। जब उनकी आयु का चतुर्थांश बीत चुका, तब उन्हें राज्य प्राप्त हुआ। उस समय उन्होंने अपने तेज से सूर्य का तेज जीत लिया था। एक लाख पूर्व कम अपनी आयु के तीन भाग तथा एक पूर्वागं तक उन्होंने राज्य किया।

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