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दुनिया जले तो जले, स्व विकास न छोड़ें : मुनिश्री सुधासागर जी के धर्मोपदेश का पुण्य अर्जन कर रहे श्रद्धालु 


निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों मप्र के गोसलपुर में प्रवचन कर रहे हैं। यहां पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने मुनि भक्तों, श्रद्धालुओं को जीवन की अनेकों रहस्यपूर्ण बातों से अवगत करवाया। गोसलपुर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर…


गोसलपुर (मप्र)। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि दुनिया में किसी भी चीज को नकारो मत, उसे सापेक्ष करके स्वीकार करो। कोई चीज तुम्हारे लिए बुरी लग रही है थोड़ा सोचो, वही चीज किसी को अच्छी भी लग रही है। विरोधी को समाप्त करने की चेष्टा मत करो, उसके विरोधी गुण को नष्ट मत करो। गाली दी है दुश्मन ने, उसका मुँह बंद मत कराओ, हो सके तो उसको गाली देने की ताकत और बढ़ाओ, थोड़ा और चढ़ाओ। ये विरोध खत्म हो जाये, नहीं सोचना क्योंकि, सृष्टि का स्वरूप है परस्पर विरोधी तत्वों से एक वस्तु बनती है, यही अनेकांत है। जल व अग्नि परस्पर विरोधी है, हमें इन दोनों का आनंद लेना है क्योंकि, हमारे लिए दोनों काम के है। अग्नि व जल कभी दोनों को एक मत करना अन्यथा तुम्हारी खुद की बर्बादी हो जाएगी। अनेकांत दृष्टि तुम्हारे लिए बहुत कल्याणकारी है, भावना भाओ कि संसार मे हर व्यक्ति, हर गुण परस्पर में विरोधी बने रहें। यदि आम नीम सब एक हो जाये तो? फिर तुम्हारे भोजन में मजा क्या आएगा। ये सृष्टि जो अच्छी लग रही है सब विरोधी तत्वों से अच्छी लग रही है।

मुनि, अरिहंत, सिद्ध बनने में सुख है

परस्पर विरोधी इस संसार का चिंतन करो, जितना भेद कर सको, असाधारण लक्षण बनाओ हर चीज का, सामान्य नहीं। इतने समताभावी मत बनो, सामान्य लक्षण से सृष्टि नहीं चलेगी, सामान्य लक्षण से सुख नहीं मिलेगा। जीव बनने में सुख नहीं है, मुनि, अरिहंत, सिद्ध बनने में सुख है। जो दूसरे से मैच न करे, उसे बोलते है असाधारण लक्षण। दूध में घी आज तक कोई दिखा नहीं पाया लेकिन जब भी घी निकला तो दूध से निकला। इसी तरह विज्ञान कहता है कि शरीर में आत्मा है ही नहीं और योगीजन अपनी साधना करके इसी आत्मा का आनंद ले रहे है। आँखांे से मत देखो सूक्ष्म पदार्थाें को, आँखों से देखोगे तो तुम कहोगे, शरीर आत्मा एक है, दूध में घी नाम की कोई चीज नहीं और सामने घी आया तो कहां से आया। महावीर स्वामी समझाते हैं कि तुम असाधारण बनो, कुछ नया प्रोडक्शन करो, नहीं तो तुम भेड़ के बच्चे बनकर रह जाओगे।

…तेरे में ज्ञान दर्शन पाया जाएगा

छह द्रव्यों में तुम स्वयं को जीव द्रव्य कहोगे तो बाकी पाँच द्रव्य तुम्हारे विरोधी हो जाएंगे। अरे 5 विरोधी जो जायंे तो हो जाने दो, हमारी कुछ नई पहचान होनी चाहिए कि मैं अलग हूँ। दुनिया में अपनी पहचान बनाना है तो विरोधी तैयार करो, जितने विरोधी होंगे, तुम उतने ही ज्यादा चमकोगे। जब 6 द्रव्यों में लक्षण खोजा जाएगा तो तेरे में ज्ञान दर्शन पाया जाएगा तो तू चैतन्य नाम से जाना जाएगा, ये जड़ नाम से जाने जायेंगे, तेरी कीमत बढ़ जाएगी। ईष्या करने वालों को तो हम मिटा नहीं पायेंगे, बस तुमसे कह सकते है कि तुम ऐसा काम मत करना जिससे दूसरों को ईष्या हो, यदि ये सूत्र लेकर चलोगे तो तुम कभी विकास नही कर पाओगे। सौ बार दुनिया जले तो जले, मुझे तो पढ़ाई करना है। दुनिया जले तो जले अपने विकास को मत छोड़ना। तुम मकान बनाओगे तो झोपडी वाले जलेंगे, तुम धन कमाओगे तो गरीब जलेंगे, नीति कहती है कि दुनिया जले तो जले यदि हम अपना विकास कर सकते हैं तो हमें विकास करना चाहिए।

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