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सागवाड़ा में पंचकल्याणक महोत्सव एवं सिद्धचक्र महामंडल विधान में उमड़ी श्रद्धा आचार्य कनकनंदी जी ने बताए मोक्ष मार्ग के सूत्र


सागवाड़ा की पुनर्वास कॉलोनी में आयोजित पंचकल्याणक महोत्सव एवं सिद्धचक्र महामंडल विधान में आचार्य श्री कनकनंदी जी के सान्निध्य में शांतिनाथ भगवान का दीक्षा कल्याणक एवं सिद्धों की आराधना श्रद्धापूर्वक सम्पन्न हुई। आचार्यश्री ने सम्यक्त्व, व्रत, तप और मोक्षमार्ग का महत्व बताया। पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया डडूका की यह रिपोर्ट।


सागवाड़ा (राजस्थान) / अजीत कोठिया डडूका। पुनर्वास कॉलोनी, सागवाड़ा में विश्ववंदनीय आचार्य श्री कनकनंदी जी के पावन सान्निध्य में आयोजित पंचकल्याणक महोत्सव एवं श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान श्रद्धा, भक्ति और धर्म प्रभावना के वातावरण में जारी है। आयोजन के अंतर्गत प्रातःकाल सिद्धों की आराधना तथा दोपहर एवं सायंकाल भगवान शांतिनाथ का दीक्षा कल्याणक महोत्सव भक्तिभाव से मनाया गया।

दीक्षा महोत्सव में भगवान शांतिनाथ के रूप में निधिप ने भूमिका निभाई, जबकि माता-पिता के पात्रों का निर्वहन अंजना देवी–अशोक कुमार कोठारी परिवार सहित विभिन्न श्रद्धालुओं ने किया। अष्टकुमारिकाओं, लोकान्तिक देवों एवं अन्य धार्मिक पात्रों की आकर्षक प्रस्तुतियों ने आयोजन को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान की।

सम्यक्त्व और व्रत ही मोक्षमार्ग के आधार

धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री कनकनंदी जी ने कहा कि शुद्ध निश्चय नय से आत्मा शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य से रहित सच्चिदानंद स्वरूप है, किन्तु जब तक आत्मा उस शुद्ध अवस्था को प्राप्त नहीं करती, तब तक शुभ कर्मों के माध्यम से पुण्य का अर्जन करना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र ही मोक्षमार्ग के मूल आधार हैं। महाव्रत, सामायिक, तप और नियम इनकी प्राप्ति के साधन हैं। बिना साधन के साध्य की सिद्धि संभव नहीं है। इसलिए व्रत, संयम और तप का पालन प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक है।

आचार्यश्री ने कहा कि जब तक मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, तब तक व्रत एवं तप के माध्यम से पुण्य अर्जित कर श्रेष्ठ गति प्राप्त करना ही श्रेयस्कर है। उन्होंने इसे एक यात्री के उदाहरण से समझाते हुए कहा कि जैसे धूप में खड़े रहने की अपेक्षा वृक्ष की छाया में प्रतीक्षा करना बुद्धिमानी है, उसी प्रकार धर्म, व्रत और तप जीवन को श्रेष्ठ दिशा प्रदान करते हैं।

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