परम पूज्य क्षपक मुनि श्री 108 वर्धमानसागर जी महाराज ने महाराष्ट्र के कुंथलगिरि सिद्धक्षेत्र में 13 दिवसीय सल्लेखना पूर्ण कर रविवार रात्रि समाधिमरण प्राप्त किया। जैन समाज ने इसे श्रद्धा, गौरव और आध्यात्मिक प्रेरणा का क्षण बताया। पढ़िए श्रीफल साथी राजेश जैन दद्दू की यह रिपोर्ट
इंदौर। भारतवर्षीय जैन समाज के लिए अत्यंत भावुक एवं आध्यात्मिक महत्व की सूचना है कि परम पूज्य क्षपक मुनि श्री 108 वर्धमानसागर जी महाराज ने महाराष्ट्र स्थित पावन कुंथलगिरि सिद्धक्षेत्र में आचार्य विद्यासागर जी महाराज के ससंघ सानिध्य में 13 दिवसीय दुर्लभ सल्लेखना पूर्ण करने के उपरांत रविवार, 5 जुलाई 2026 की रात्रि 11:34 बजे समाधिमरण प्राप्त किया।
13 दिवस की दुर्लभ सल्लेखना पूर्ण
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि पूज्य मुनिश्री ने सभी प्रकार के रसों का त्याग करते हुए पूर्ण आत्मसंयम, समता और वैराग्य के साथ सल्लेखना साधना संपन्न की। उनका समाधिमरण जैन साधना परंपरा का प्रेरणादायी उदाहरण माना जा रहा है।
संयममय जीवन रहा प्रेरणा का स्रोत
पूज्य वर्धमानसागर जी महाराज ने अपना संपूर्ण जीवन संयम, तपस्या, स्वाध्याय, आत्मकल्याण एवं धर्म प्रभावना को समर्पित किया। उनके जीवन ने यह संदेश दिया कि देह के प्रति मोह का त्याग ही वास्तविक वीतरागता और आत्मकल्याण का मार्ग है।
इंदौर सहित देशभर में श्रद्धांजलि
इंदौर सहित देशभर के श्रद्धालुओं ने पूज्य मुनिश्री के श्रीचरणों में विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने कहा कि पूज्य गुरुदेव द्वारा दिए गए धर्म, करुणा, क्षमा एवं अपरिग्रह के संदेश सदैव समाज का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
समाज के गणमान्यों ने अर्पित की विनयांजलि
इंदौर समाज के वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. जैनेन्द्र जैन, महावीर ट्रस्ट के अध्यक्ष अमित कासलीवाल, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, नवीन गोधा, हंसमुख गांधी, टी.के. वेद, मयंक जैन, फेडरेशन की राष्ट्रीय शिरोमणि संरक्षिका श्रीमती पुष्पा कासलीवाल, महिला परिषद संभागीय अध्यक्ष श्रीमती मुक्ता जैन तथा श्रीमती रेखा जैन (श्रीफल) सहित अनेक समाजजनों ने पूज्य क्षपक मुनि श्री वर्धमानसागर जी महाराज के श्रीचरणों में भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए शत-शत नमन किया।
धर्म साधना का अमर संदेश
जैन समाज ने पूज्य मुनिश्री के समाधिमरण को शोक के साथ-साथ आध्यात्मिक गौरव का क्षण बताया। श्रद्धालुओं ने उनके आदर्शों को जीवन में अपनाते हुए संयम, समता, तप और धर्मभाव को दृढ़ करने का संकल्प व्यक्त किया।













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