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कृष्ण लेश्या और शुक्ल लेश्या का वैज्ञानिक विश्लेषण : वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने बताया भावों की शुद्धि का मार्ग


सागवाड़ा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने कृष्ण लेश्या और शुक्ल लेश्या के स्वरूप, उनके प्रभाव तथा आत्मकल्याण में सम्यक दर्शन और शुभ भावों के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया डडूका की यह रिपोर्ट।


सागवाड़ा (राजस्थान)। पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने अपने प्रवचनों में कृष्ण लेश्या एवं शुक्ल लेश्या के आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक पक्षों की विस्तार से व्याख्या करते हुए आत्मशुद्धि एवं सदाचार का संदेश दिया।

कृष्ण लेश्या का स्वरूप

गुरुदव ने कहा कि कृष्ण लेश्या वाले व्यक्ति बाहर से आकर्षक, शांत और सरल दिखाई दे सकते हैं, किंतु उनके भीतर हिंसा, क्रोध, छल, कपट और विनाशकारी भाव विद्यमान रहते हैं। ऐसे लोग दुष्ट प्रवृत्तियों, भ्रष्टाचार, मिलावट, विषय-भोग और अधर्म की ओर प्रवृत्त होकर अपने जीवन को पतन की दिशा में ले जाते हैं। उन्होंने कहा कि अशुभ भावों से युक्त जीव धर्म करते हुए भी पाप के कारण निम्न गतियों में दुःख भोगते हैं।

शुक्ल लेश्या का महत्व

वैज्ञानिक धर्माचार्य ने बताया कि शुक्ल लेश्या वाले जीव राग-द्वेष से मुक्त होकर दया, करुणा, विनय, सेवा, दान और सम्यक दर्शन का पालन करते हैं। वे गुरुजनों की संगति करते हैं, साधुओं को आहारदान देते हैं, किसी की निंदा नहीं करते तथा धर्म को अपने आचरण में उतारते हैं। ऐसे शुभ भावों वाले जीव उच्च गति को प्राप्त करते हैं।

सम्यक दर्शन का संदेश

गुरुदेव ने कहा कि आत्मा का अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित होना ही सम्यक दर्शन है। यह जीव का मूलभूत गुण है। आत्मचिंतन, शुभ भाव और संयमपूर्ण जीवन ही आध्यात्मिक उन्नति का आधार हैं।

मंगलाचरण एवं सहभागिता

कार्यक्रम में मुनिश्री सुविज्ञ सागरजी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता “देखो देखो सर्वत्र देखो, तन को देखो मन को देखो” के माध्यम से मंगलाचरण किया। कार्यक्रम की जानकारी श्रीमती विजयलक्ष्मी गोदावत, सागवाड़ा द्वारा प्रदान की गई।

संदेश एवं सामाजिक महत्व

प्रवचन में बताया गया कि मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य उसके बाहरी रूप में नहीं, बल्कि उसके अंतःकरण की पवित्रता, शुभ भाव, संयम और सदाचार में निहित है। आत्मशुद्धि ही मोक्षमार्ग की प्रथम सीढ़ी है।

समापन

वेबीनार का समापन धर्म, संयम, सम्यक दर्शन और आत्मकल्याण के संदेश के साथ हुआ। उपस्थित श्रद्धालुओं ने गुरुदेव के प्रवचनों को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।

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