आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रपुरी बड़ के बालाजी जयपुर में 36 साधुओं सहित विराजित हैं।44 वर्षीय समर कंठाली जैन इंदौर ने अपने जन्म दिन के उपलक्ष्य में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सानिध्य में 14 मई को श्री चन्द्रप्रभ भगवान की पूजन अष्ट द्रव्यों विभिन्न फलों, नैवेद्य,पुष्प सूखे मेवे भक्ति नृत्य पूर्वक की। जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…
जयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रपुरी बड़ के बालाजी जयपुर में 36 साधुओं सहित विराजित हैं। 21 वीं सदी की भौतिकवादी चकाचौंध में जहां करोड़पति, अरबपति अपना धन का वैभव शादी, सालगिरह, जन्मदिन विदेश में मनाते हैं किंतु, कुछ पुण्यशाली सक्षम ऐसे युवा भी होते हैं, जो अपने द्रव्य का उपयोग अपना जन्मदिन गुरु सानिध्य में भगवान की पूजन और पंचामृत धार्मिक अनुष्ठान आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सान्निध्य में करते हैं। 44 वर्षीय समर कंठाली जैन इंदौर ने अपने जन्म दिन के उपलक्ष्य में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सानिध्य में 14 मई को श्री चन्द्रप्रभ भगवान की पूजन अष्ट द्रव्यों विभिन्न फलों, नैवेद्य,पुष्प सूखे मेवे भक्ति नृत्य पूर्वक की। 15 मई को आचार्य संघ सनिध्य में भगवान श्री चंद्रप्रभ का भव्य पंचामृत अभिषेक जल,नारियल पानी,शर्करा,विभिन्न फलों और सुखे मेवों के रसों, दूध , धी,दही, सर्वोषधि,विभिन्न पुष्प केशर,सुगंधित जल ,चार कलश एवं शांतिधारा की। यहां यह उल्लेखनीय है कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से दीक्षा लेकर आपके नाना जी मुनिश्री चारित्र सागर जी, ममेरी बहन आर्यिका श्री महायश मति एवं जन्मदायिनी माता आर्यिका श्री निर्मोह मति जी आचार्य श्री संघ में संयम साधना कर रही हैं। विगत 3 वर्षों में चातुर्मास में चौका लगाने के बाद वर्ष 2025 टोंक चातुर्मास के बाद से स्वयं निरंतर चौका परिजनों मामा, मामी, मौसाजी,मौसी, बहन,ओर परिजनों के सहयोग से चला रहे हैं।
अंतरंग संस्कार पूर्व पुण्य से आते हैं
सुरेश सबलावत ,भागचंद चुड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उपदेश में बताया कि धर्म और संस्कार पूर्व जन्मों के पुण्य का परिणाम हैं। यदि आज जैन कुल मिला,धर्ममिला,गुरुदेव मिले,तो यह पूर्व जन्मों के पुण्य और सत्संग का परिणाम है।यही कारण है कि भीतर से भावना आती है मैं पाप न करूँ, पुण्य करूँ। संतान में भी संस्कार साथ आते हैं बालक जन्म से ही कुछ संस्कार लेकर आता है। यदि घर में धर्म और सत्संग का वातावरण हो तो बच्चों के मन में भी पाप से बचने और पुण्य करने की प्रेरणा रहती है। संगति का प्रभाव बाद में पड़ता है, लेकिन अंतरंग संस्कार पूर्व पुण्य से आते हैं। शुभ लक्ष्य से हर क्रिया पुण्यदायी बन जाती है।यदि मन में संकल्प हो “मुझे जिनेंद्र भगवान के दर्शन करने जाना है तो उसके बाद की सारी क्रियाएँ पुण्यदायी बन जाती हैं। स्नान करना,शुद्ध वस्त्र पहनना,मंदिर की ओर चलना, पूजा सामग्री लेना, मंदिर तक पहुँचना। क्यों?क्योंकि लक्ष्य भगवान का दर्शन है।मंदिर जाने की भावना से पुण्य की श्रृंखला शुरू हो जाती हैजैसे ही मन में भाव आया “मुझे भगवान के दर्शन करने जाना है”उसी क्षण से पुण्य आरंभ हो जाता है।और जैसे-जैसे व्यक्ति आगे बढ़ता है पुण्य और विशुद्धि बढ़ती जाती है।अंत में भगवान के दर्शन और परिक्रमा से अनंत पुण्य का बंध होता है।













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