मनुष्य सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि यदि कोई रही है, तो वह केवल नगरों का निर्माण, विज्ञान की प्रगति अथवा आर्थिक संपन्नता नहीं, अपितु परिवार नामक वह आत्मीय संस्था है। विश्व परिवार दिवस पर सुनील सुधाकर शास्त्री का यह आलेख…
मनुष्य सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि यदि कोई रही है, तो वह केवल नगरों का निर्माण, विज्ञान की प्रगति अथवा आर्थिक संपन्नता नहीं, अपितु परिवार नामक वह आत्मीय संस्था है, जिसने मनुष्य को पशुता से ऊपर उठाकर संवेदनशीलता, सह-अस्तित्व और संस्कारों का पाठ पढ़ाया। परिवार केवल रक्त-संबंधों का समूह नहीं होता, वह मनुष्य के भीतर धड़कती हुई करुणा, सहनशीलता, समर्पण और अपनत्व की वह विराट पाठशाला है, जहाँ व्यक्ति “ मैं ” से “ हम ” तक की यात्रा करता है। किंतु आज के समय का सबसे बड़ा संकट यही है कि यह “हम” निरंतर सिमटता जा रहा है और “मैं” का अहंकार असहनीय विस्तार पा रहा है। परिणामस्वरूप रिश्ते सिकुड़ रहे हैं, परिवार टूट रहे हैं और मनुष्य भीतर से अत्यंत अकेला तथा रिक्त होता जा रहा है।
आज का व्यक्ति स्वयं को आधुनिकता के शिखर पर स्थापित मानता है, परंतु विडंबना यह है कि उसकी आत्मा संबंधों के दिवालियेपन से ग्रस्त होती जा रही है। जीवन का केंद्र अब परिवार नहीं, स्वार्थ बन चुका है। पहले जहाँ संतान को ईश्वर का आशीर्वाद माना जाता था, वहीं अब उसे आर्थिक बोझ और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में बाधा के रूप में देखा जाने लगा है। सरकारी नीतियों, भौतिकवादी जीवन-दृष्टि और सीमित सुखों की लालसा ने मनुष्य को इस सीमा तक आत्मकेंद्रित बना दिया है कि वह एक या दो बच्चों तक सीमित हो गया है, और अनेक दंपत्ति तो संतान उत्पन्न ही नहीं करना चाहते। यह केवल जनसंख्या का प्रश्न नहीं, अपितु परिवार के प्रति घटते प्रेम और उत्तरदायित्व-बोध के लुप्त होने का संकेत है।
जब परिवार छोटे होते जाते हैं, तब रिश्तों का विराट वृक्ष भी सूखने लगता है। बुआ, फूफा, मौसी, मामा, चाचा, ताऊ, भाई-बहन जैसे आत्मीय संबंध धीरे-धीरे स्मृतियों की वस्तु बनते जा रहे हैं। आने वाली पीढ़ियाँ संभवतः केवल शब्दकोशों में इन रिश्तों का अर्थ खोजेंगी, क्योंकि उनके जीवन में इनका कोई जीवंत अनुभव नहीं होगा। “वसुधैव कुटुम्बकम्” का महान भारतीय आदर्श, जिसने सम्पूर्ण विश्व को परिवार मानने की दृष्टि दी थी, आज अपने ही घरों में दम तोड़ता दिखाई दे रहा है।
आज मनुष्य का विश्वास संबंधों से उठता जा रहा है। वह केवल अपने छोटे-से निजी संसार में सीमित होकर जीना चाहता है। भाई-भाई के बीच सामंजस्य समाप्त हो रहा है। पिता-पुत्र एक ही घर में रहते हुए भी दो पृथक संसारों के निवासी बन चुके हैं। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि यदि किसी पिता का एकमात्र पुत्र भी है, तो वहाँ भी दो परिवार निर्मित हो जाते हैं—एक माता-पिता का और दूसरा पुत्र-पुत्रवधू का। यह केवल भौतिक विभाजन नहीं, बल्कि भावनात्मक विखंडन है।
समाज में ऐसे असंख्य उदाहरण दिखाई देते हैं जहाँ पाँच-पाँच पुत्र होते हुए भी माता-पिता वृद्धावस्था में उपेक्षा और भूख का जीवन जीने को विवश हैं। जिन हाथों ने संतान को चलना सिखाया, वही हाथ वृद्धावस्था में सहारे के लिए तरसते हैं। जिन आँखों ने बच्चों के भविष्य के लिए अपने सपनों का बलिदान किया, उन्हीं आँखों में आज उपेक्षा के आँसू तैरते दिखाई देते हैं। यह केवल परिवारों का संकट नहीं, बल्कि सभ्यता के पतन का संकेत है।
मनुष्य ने भौतिक सुखों की प्राप्ति तो कर ली, किंतु आत्मीयता खो दी। उसने विशाल भवन बना लिए, पर उनमें रहने वाले हृदय छोटे हो गए। उसने सुविधाएँ अर्जित कर लीं, परंतु सहनशीलता और सामंजस्य खो दिया। यही कारण है कि आज परिवारों में संवाद कम और विवाद अधिक हैं। छोटी-छोटी बातों पर संबंध टूट जाते हैं, क्योंकि त्याग और धैर्य की संस्कृति विलुप्त होती जा रही है।
यदि पारिवारिक मूल्यों को बचाना है, तो हमें केवल आर्थिक विकास की नहीं, भावनात्मक विकास की भी आवश्यकता होगी। हमें पुनः यह स्वीकार करना होगा कि परिवार केवल व्यक्तियों का समूह नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की आधारशिला है। समाज की स्थिरता संगठित परिवारों पर ही निर्भर करती है। अतः आवश्यक है कि हम अपनी प्रजनन दर के विषय में भी समग्र सामाजिक दृष्टि से विचार करें। केवल “हम दो, हमारे दो” अथवा “जितना है वही पर्याप्त है” जैसी सीमित सोच से ऊपर उठकर हमें यह समझना होगा कि स्वस्थ और विस्तृत पारिवारिक संरचना ही सामाजिक संतुलन की आधारभूमि है। यदि रिश्ते जीवित रहेंगे तभी समाज में आत्मीयता, सहयोग और सांस्कृतिक निरंतरता बनी रहेगी।
इसके साथ ही हमें स्वार्थ से हटकर समग्र राष्ट्र-चिंतन को अपनाना होगा। परिवार केवल निजी संस्था नहीं, राष्ट्र-निर्माण की प्रथम पाठशाला है। जिस समाज के परिवार टूट जाते हैं, वहाँ संस्कृति अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकती। अतः सहनशीलता, सामंजस्य और त्याग के माध्यम से परिवारों के विखंडन को रोकना होगा। माता-पिता के प्रति बहुमान और श्रद्धा की संस्कृति को पुनः जागृत करना होगा।
विद्यालयों में केवल विज्ञान और तकनीक की शिक्षा पर्याप्त नहीं है; वहाँ राम, लक्ष्मण और भरत श्रवण कुमार जैसे आदर्शों की शिक्षा भी अनिवार्य होनी चाहिए। त्याग, प्रेम, भाईचारा और पारिवारिक समर्पण के संस्कार यदि नई पीढ़ी को नहीं दिए गए, तो आने वाला समाज अत्यंत संवेदनहीन और अकेला होगा। भारतीय संस्कृति के मूल्यों का अध्ययन, अध्यापन और व्यापक प्रचार-प्रसार ही संगठित परिवारों की आत्मा को बचा सकता है।
यह समय आत्ममंथन का है। यदि संबंधों की ऊष्मा समाप्त हो गई, तो मनुष्य चाहे जितनी प्रगति कर ले, भीतर से वह सदैव निर्धन रहेगा। परिवारों का विघटन केवल चार दीवारों का टूटना नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा का बिखरना है। इसलिए आवश्यक है कि हम फिर से संबंधों की उस पवित्र धरती पर लौटें, जहाँ त्याग था, अपनापन था, सहनशीलता थी और एक-दूसरे के लिए जीने का आनंद था। क्योंकि अंततः मनुष्य को जीवन के अंतिम क्षणों में धन नहीं, संबंध ही सहारा देते हैं; और वही समाज जीवित रहता है, जिसके परिवार जीवित रहते हैं।
जोड़ते ,जुड़ते चलो, तो राष्ट्र का सम्मान होगा।
टूट कर बिखरे अगर, स्थान कूड़ादान होगा।।













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