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परिवार को महाभारत नहीं, रामचरितमानस बनाएं : रामचरितमानस कर्तव्यों के पालन और त्याग की गाथा महाभारत में ‘अहंकार’ प्रधान


आज के दौर में बढ़ते पारिवारिक बिखराव को देखते हुए यह विचार आवश्यक हो गया है कि हम अपने घरों को कुरुक्षेत्र बनने से बचाएं। महाभारत और रामचरितमानस दो विपरीत जीवन-दृष्टिकोणों के दर्पण हैं। आज पढ़िए, अभय जैन ” अकिंचन के यह विचार…


आज के दौर में बढ़ते पारिवारिक बिखराव को देखते हुए यह विचार आवश्यक हो गया है कि हम अपने घरों को कुरुक्षेत्र बनने से बचाएं। महाभारत और रामचरितमानस दो विपरीत जीवन-दृष्टिकोणों के दर्पण हैं। जहाँ महाभारत अधिकारों की जंग और विनाश का प्रतीक है, वहीं रामचरितमानस कर्तव्यों के पालन और त्याग की गाथा है। महाभारत में ‘अहंकार’ प्रधान है, जहाँ भाई-भाई के हक को छीनने की चेष्टा करता है। इसके विपरीत, रामचरितमानस ‘समर्पण’ सिखाता है, जहाँ राम पिता के वचन के लिए राज्य छोड़ देते हैं और भरत अधिकार होने पर भी उसे स्वीकार नहीं करते।

घर को शांतिपूर्ण बनाने हेतु हमें कुछ सूत्र अपनाने होंगे

अधिकारों के बजाय कर्तव्यों को प्राथमिकता दें। वाणी में मर्यादा रखें, क्योंकि कटु वचन ही कलह की जड़ हैं। अपनों के लिए थोड़ा झुकना और त्याग करना सीखें।

यदि हर घर में रामचरितमानस के संस्कार होंगे, तो ईर्ष्या और विवाद के लिए कोई स्थान नहीं बचेगा। ग्रंथ केवल अलमारी में न हों, बल्कि हमारे आचरण में हों। रिश्तों में ‘राम’ जैसा धैर्य और ‘भरत’ जैसा प्रेम ही घर को वास्तव में स्वर्ग बना सकता है।

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