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विजाति और विधर्मी विवाह आगम सम्मत नहीं है- निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराजः महाराज के प्रवचनों को सुनने के लिए जिन समुदाय में उल्लास का माहौल


सागर में विराजित मुनिश्री सुधा सागर जी महाराज ने प्रबोधन में जीवन के कई पहलुओं पर ध्यान आकर्षित किया। उनके प्रवचनों को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ रहे हैं। पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर…


सागर। तुम जैन हो इसमें कोई संदेह नहीं क्योंकि तुम्हारे बाप जैन थे। जैन तुम्हें बलदियत में मिला है क्योंकि, जैन शब्द जातिवाचक हो गया, गुणवाचक नहीं रहा। पहले जितनी भी जातियां थी वे वर्ण या कर्म के आधार पर थी। एक घर में क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तीनों पाए जा सकते हैं, एक भाई क्षत्रिय है, एक भाई व्यापार कर रहा है तो वैश्य है और एक भाई शिल्प का काम कर रहा है तो शुद्र है। इसलिए ऋषभदेव ने यह वर्ण की व्यवस्था कर्म के आधार पर की थी। जो जैसा कर्म करेगा वो वो है, भाई या रिश्तेदार से मतलब नहीं है। यह प्रबोधन सागर में विराजित निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने धर्मसभा में दिए।

सभी को 72 कलाएं आनी चाहिए

जितनी 72 कलाएं हैं यह सब क्षत्रिय कर सकता है, राजा या रानी कोई भी हो सबको ये 72 कलाएं आना चाहिए। जिनको इनका ज्ञान नहीं है उनको गृहस्थ होने का अधिकार नहीं है। ऋषभदेव कहते है यदि आपको 72 कलाओं का ज्ञान नहीं है तो आपकी गृहस्थी संकट में पड़ेगी। आप से और अपने बच्चों को भी 72 कलाओं का ज्ञान करवाओ। आज की शिक्षा एकांकी है यदि सफल हो गए तो ऊंचाई पर पहुंचोगे और असफल हो गये तो बेरोजगार बनोगे। आपको बर्तन बनाने, कपड़े सिलने, जूते बनाने, झाड़ू लगाना, गंदगी साफ करना भी आना चाहिए। आपको जुआ खेलना, चोरी करना भी आना चाहिए, आपको संगीत, नाचना भी आना चाहिए, ये बहुत काम की चीजें है। ये जिंदगी के बहुत बड़े रहस्य है।

कला को अपनी आजीविका का साधन बना लो

अपराध शास्त्र जो व्यक्ति नहीं जानता है, उसकी जिंदगी का बहुत बड़ा शोषण होगा, चोर तुम्हारे यहां चोरी करते रहेंगे और तुम लूटते रहोगे इसलिए तुम्हें ज्ञान होना चाहिए चोरी कैसे की जाती है, जुआ कैसे खेला जाता है, ये सब शास्त्र है। रामचंद्र जी को गुरु ने बर्तन बनाना सिखाया था, बर्तन बनाना तो कुम्हार का काम है। अब यहां पर आपको सीखना बस है, लेकिन आप जिस कला को अपनी आजीविका का साधन बना लेंगे तो वहीं से वर्ण व्यवस्था चालू हो जाएगी। आपने चोरी को आजीविका का साधन बना लिया तो आप डाकू कहलाएंगे। ऋषभदेव ने चोर कला, चोरी करने के लिए नहीं, चोरों से सावधान रहने के लिए सिखाइर्, क्योंकि जब तक अपराधी की कल नहीं जानेंगे, अपराधी तक पहुंच नहीं पाएंगे।

धर्मराज को दासता का अनुभव करना पड़ा

पुरुषों को स्त्री बनना भी आना चाहिए। यहां तक की हिजड़ा बना भी आना चाहिए क्योंकि, अर्जुन ने अज्ञातवास में इसी तरह अपनी रक्षा की थी। किसी की दासता करना भी आना चाहिए क्योंकि, धर्मराज को दासता का अनुभव करना पड़ा। तुम्हें भीख मांगना भी आना चाहिए क्योंकि, यह दुनिया है यहां कुछ भी हो सकता है। 72 कलाएं जिनके पास होती हैं वे कभी भूखो नहीं मर सकते, चाहे भली उन्हें देश निकाला दे दो। श्रीराम को झोपड़ी बनाना नहीं आता तो पेड़ के नीचे बैठे-बैठे क्या होता। नाच गान आपको सीखना है लेकिन नाच गान से आजीविका मत चलाना, आप शुद्र की कोटि में चले जाएंगे।

यदि शुद्र की कन्या आएगी तो तुम्हारे रिश्तेदार की कन्या है

जिसको जूता चप्पल बनाना आता है उससे साधु आहार ले सकते हैं लेकिन, आजीविका नहीं होना चाहिए। जूत्ते चप्पल की दुकान वाला न तो अभिषेक कर सकता है और न ही आहार दे सकता है, उसके लिए वही नियम होंगे जो शुद्र पर होते हैं क्योंकि, वह उससे आजीविका कर रहा है। शास्त्रों में 72 कलाएं लिखी हैं। 72 आजीविका के साधन नहीं लिखे। आजीविका के कारण वर्तमान में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र के भेद किए गए। यदि शुद्र की कन्या आएगी तो तुम्हारे रिश्तेदार की कन्या है, उसको हम पुनः व्यापार छुड़ायेंगे, आप इस आजीविका से कमाया हुआ धन नहीं खाओगे, पीहर में पानी भी नही पियेंगे क्योंकि, अब आप क्षत्रिय कुल में आ चुके हैं, अब वो साधु को आहार दे सकती है। पिता का संबंध तो रहेगा लेकिन आजीविका का संबंध टूट जाएगा, खान पान छूट जाएगा। वहां का दाना भी ग्रहण नहीं करेगी, रिश्तेदारी का व्यवहार भी नही लेगी क्योंकि, उसी कमाई से आएगा।

…तो नियम से मिथ्यात्व की कोटि में ही आएगा

वर्तमान में जाति व्यवस्था अलग हो गई तो धर्म भी अलग होगा, गुरु भी अलग होगा, आचार विचार भी अलग होगा। आज जातिगत बंटवारा होने से जाति का संबंध जाति में ही बनेगा, विवर्ण में बन सकता था, विजाति में नहीं तो विजाति व विधर्मी विवाह आगम सम्मत नहीं है। आप उनसे जो संबंध बनाएगा वह नियम से मिथ्यात्व की कोटि में ही आएगा। जो कार्य जैन कर सकता है, उतने ही कार्य विजाति विवाह करने वाला करेगा।

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