हमें जो प्रकृति से मिला है उसका स्वागत करना है। इस जिंदगी को गुजारो मत जिंदगी को नैगलेक्ट मत करो। यह उद्गार मुनिश्री सुधा सागर सभागार में धर्मसभा में मुनिश्री सुधासागरजी महाराज ने व्यक्त किए। मुंगावली से पढ़िए, यह खबर…
मुंगावली। हमें जो प्रकृति से मिला है उसका स्वागत करना है। इस जिंदगी को गुजारो मत जिंदगी को नैगलेक्ट मत करो। यह उद्गार मुनिश्री सुधा सागर सभागार में धर्मसभा में मुनिश्री सुधासागरजी महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जिंदगी मिली है तो इसको अच्छी तरह से जीना सीखो। कितने लोग अपनी खुद की जिंदगी को कोसते हैं। ऐसे है ही निगोद आदि की यात्रा करते हैं। एक सांस में आठ-दस बार मरते हैं। आपको जो भी जिंदगी मिली है। इसका हमेशा वैलकम करना कुदरत ने आपको जिंदगी दी तो है इतना और भी कह देना कि मैं बहुत भाग्यशाली हूं जो मुझे मनुष्य की पर्याय मिली प्रभु का धन्यवाद करो। जैसे ही तुमने वेलकम किया फिर देखना आपका विकास होना शुरू हो जाएगा। इसलिए प्रकृति ने जो तुम्हारे लिए दिया है, उसमें ख़ुश रहना है।
भगवान से भी ज्यादा ताकत भगवान की मूर्ति में होती है
मुनिश्री ने कहा कि भगवान से भी ज्यादा ताकत भगवान की मूर्ति में होती है। साक्षात भगवान से भले आप को कुछ ना मिले लेकिन, श्रद्धा से अपनी भक्ति अंतरआत्मा की आवाज पर आपने जो मूर्ति बैठाई है, वह आपको सबकुछ दे सकती है, जिस कार्य में आपका कोई योगदान ना हो उससे कुछ भी पाने की कोशिश मत करना। किसी पेड़ से आप एनर्जी चाहते हो तो आपने कभी उसे पानी दिया है, उसके बारे में सोचा है। किसान को सूखी रोटी बहुत ताकत देती है। वहीं रोटी आपका घी दूध से मान मलिदा बनाकर भी खाए तो भी वह व्यक्ति की भूख मिटाने का ही काम करेगी, आपको दुआएं नहीं दे सकती।
हर व्यक्ति सर्व प्रसिद्ध होना चाहता है
मुनिश्री ने कहा हर व्यक्ति प्रसिद्ध होना चाहता है। सारी दुनिया का मैं स्वामी बनना चाहता है। अपनी हुकूमत सारी दुनिया पर चलना चाहता है। यहां तक कि सारी दुनिया भगवान का बाप बनना चाहती है। इसके लिए पैसे भी देने को तैयार है। भगवान बनने में कोई पैसा नहीं लगता। फोकट में ही बन जाएंगे। भगवान के माता-पिता की पूछ उनके रहने तक ही है। आप स्वयं ही समझ सकते हैं कि जब तक तीर्थंकर प्रभु घर में थे तब तक ही उनकी बखत थी, जो सौधर्म इन्द्र सैकड़ों बार अयोध्या आया। वहीं सौधर्म इन्द्र क्या कोई भी देवता दीक्षा के बाद एक भी माता-पिता की खबर नहीं लेता फिर भी हर व्यक्ति भगवान के माता-पिता बनने को तैयार हैं। भगवान की पूजा तीन लोक में तीनों काल में हो रही है। इतने व्यापक हो गए कि जनता ने उनकी मूर्ति बना ली हमने कहा था कि भगवान तो चले गए ओरिजनल भगवान की ताकत तो एक थी लेकिन, भक्तों के भगवान कितने हैं। हर प्रतिमा का अतिशय अलग-अलग होता है, हर मूर्ति की ताकत अलग-अलग है मूर्तियां भक्तों की श्रद्धा से बनी है।
मुंगावली के व्यक्ति को कोई ठग नहीं सकता
मुनिश्री सुधासागर जी ने कहा कि ये राज दरबार में चर्चा के दौरान घोषणा हुई कि जो भी व्यक्ति पांच सौ रुपए से इस हांल को भरेगा, उसे राज दरबार में मंत्री बनाया जाएगा। उस सभा में मुंगावली का व्यक्ति भी था। उसे पांच सौ रुपए मिले, वह कहता है पांच सौ रुपए में हाल भरता है क्या? वह रुपए लेकर घर आ गया। मुंगावली के व्यक्ति को कोई ठग सकता है ? अशोक नगर का तो और भी होशियार है। काश्मीर से कन्याकुमारी तक सारा भारत एक है। सब एक हैं, दूसरे ने नपा के कचड़े से भर दिया। तीसरा व्यक्ति गया राजा साहब को माला पहनाकर स्वागत करता है कहता है कि अतिथि का सत्कार करना हमारी परंपरा है और उन्हें हाल की ओर पधारने का निवेदन करता है। इस बीच वह उस हाल में पांच दीप प्रज्वलित कर अगरवत्ती से उस हाल को प्रकाशित कर सुगंधित कर देता है। बस इतना ही तो करना है, अपनी जिंदगी को प्रकाश और सुगंध से भर दो।













Add Comment