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दो दिवसीय पंचकल्याणक महोत्सव सागवाड़ा में सम्पन्न : समवशरण की वैज्ञानिक व्याख्या से श्रद्धालु हुए अभिभूत


सागवाड़ा के अहिंसा नगर पुनर्वास कॉलोनी में आयोजित दो दिवसीय पंचकल्याणक महोत्सव वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव एवं आज्ञासागर जी संघ के सान्निध्य में श्रद्धा और उल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया डडूका की यह रिपोर्ट।


सागवाड़ा। अहिंसा नगर, पुनर्वास कॉलोनी में आयोजित दो दिवसीय पंचकल्याणक महोत्सव वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव एवं आज्ञासागर जी संघ के पावन सान्निध्य में भक्ति, श्रद्धा और धार्मिक उत्साह के साथ सम्पन्न हुआ। महोत्सव में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर पंचकल्याणक की विभिन्न धार्मिक क्रियाओं का लाभ प्राप्त किया।

पंचकल्याणक की विधियां हुईं सम्पन्न

महोत्सव में इंद्र-इंद्राणियों एवं माता-पिता के पात्रों ने पंचकल्याणक की सभी धार्मिक विधियों का निर्वहन किया। समापन अवसर पर भगवान पार्श्वनाथ, आदिनाथ, महावीर, शांतिनाथ एवं सिद्ध भगवान के धातु बिंबों को विधि-विधानपूर्वक प्रतिष्ठित कर भव्य शोभायात्रा के साथ विमलनाथ जैन मंदिर में विराजमान कराया गया।

समवशरण का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन

धर्मसभा में आचार्य कनकनंदी गुरुदेव ने भगवान के समवशरण की वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि प्रत्येक जीव में अनंत ज्ञान, दर्शन, सुख और शक्ति विद्यमान है, किन्तु कर्मों के आवरण के कारण वह प्रकट नहीं हो पाती। साधना, ध्यान और कर्मनिर्जरा के माध्यम से आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करती है और केवलज्ञान की अवस्था में भगवान का शरीर दिव्य एवं पारदर्शी बन जाता है।

दिव्यध्वनि और केवलज्ञान का महत्व

आचार्यश्री ने बताया कि केवलज्ञान प्राप्त होने पर भगवान की दिव्यध्वनि बिना मुख, होठ अथवा कंठ के संचालन के समस्त जीवों तक उनकी-उनकी भाषा में पहुंचती है। उन्होंने इसे भगवान के अतिशय का अद्भुत स्वरूप बताते हुए कहा कि समवशरण में उपस्थित जीवों को भूख-प्यास का अनुभव भी नहीं होता तथा भगवान किसी निमंत्रण से नहीं, बल्कि भव्य जीवों के पुण्य के प्रभाव से वहां विराजमान होते हैं।

आत्मकल्याण का दिया संदेश

धर्मसभा में उपस्थित मुख्य श्रोता राजेंद्र जी गोवाड़िया की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि दान, पूजा, संयम और आत्मचिंतन ही गृहस्थ जीवन के प्रमुख धर्म हैं। उन्होंने मोह, लोभ, राग, द्वेष, ईर्ष्या और प्रमाद का त्याग कर आत्महित की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश दिया। उनके अनुसार आत्मा को जानना और पहचानना ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।

श्रद्धालुओं की रही सहभागिता

महोत्सव में आचार्य कनकनंदी, आज्ञासागर जी, सुविज्ञसागर जी, आध्यात्मनंदी, सौम्यनंदी, आर्यिका सुवत्सलमति, सुप्रज्ञाश्री, भक्तिश्री सहित संघ की गरिमामयी उपस्थिति रही। आयोजन की जानकारी संकलनकर्ता विजयलक्ष्मी गोदावत, सागवाड़ा द्वारा प्रदान की गई।

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