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भगवान वासुपूज्य का गर्भ कल्याणक 6 जुलाई को: आस्था, आराधना और दिव्य संदेशों का महापर्व


भगवान वासुपूज्य जी का गर्भ कल्याणक 6 जुलाई को मनाया जाएगा। आषाढ़ कृष्ण षष्ठी के पावन दिन को दिगंबर जैन समाज में अत्यंत भक्ति, श्रद्धा और उल्लास के साथ गर्भ कल्याणक पारंपरिक रूप से मनाते हैं। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…


इंदौर। भगवान वासुपूज्य जी का गर्भ कल्याणक 6 जुलाई को मनाया जाएगा। आषाढ़ कृष्ण षष्ठी के पावन दिन को दिगंबर जैन समाज में अत्यंत भक्ति, श्रद्धा और उल्लास के साथ गर्भ कल्याणक पारंपरिक रूप से मनाते हैं। यह वह शुभ घड़ी है, जब तीर्थंकर की पवित्र आत्मा ने स्वर्गलोक (प्राणत स्वर्ग) से अवतरित होकर चंपापुरी की महारानी जयादेवी के गर्भ में प्रवेश किया था। गर्भ कल्याणक केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है, बल्कि यह एक आत्मा के परमात्मा बनने की यात्रा का प्रथम सोपान है। जैन आगम के अनुसार, जब कोई तीर्थंकर पृथ्वी पर जन्म लेने वाले होते हैं तो उनके अवतरण से छह माह पूर्व ही स्वर्ग के देवगण माता के प्रांगण में रत्नों की वर्षा करने लगते हैं और माता सोलह शुभ स्वप्न देखती हैं। चंपापुरी के इक्ष्वाकु वंशीय राजा वासुपूज्य और रानी जया के आंगन में जो दिव्य प्रकाश उतरा, वह आज भी जैन श्रद्धालुओं के दिलों को अपने तेज से आलोकित कर रहा है।

जिनालयों में भक्ति के स्वर और भगवान के दिव्य संदेश

6 जुलाई को देश भर के दिगंबर जैन मंदिरों में इस पुनीत अवसर पर विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाएगा, जहां प्रातः काल से ही प्रभु के दरबार में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ेगी और पूरा वातावरण मंगल ध्वनियों से गुंजायमान रहेगा। भगवान वासुपूज्य की मनोहारी लाल वर्ण की प्रतिमा का स्वर्ण और रजत कलशों से मंत्रोच्चार के साथ अभिषेक किया जाएगा तथा विश्व कल्याण, समाज की सुख-समृद्धि और रोगों के नाश की कामना के साथ प्रभु के मस्तक पर शांतिधारा की जाएगी। जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप और फल-इन अष्टद्रव्यों के माध्यम से पूर्ण समर्पण और भक्ति भाव के साथ नित्यमह पूजन एवं विधान संपन्न किए जाएंगे।

इस पावन दिन पर केवल बाह्य पूजा ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रभु के दिव्य संदेशों को अपने आचरण में उतारना ही उनकी सच्ची आराधना है। प्रभु वासुपूज्य ने सिखाया कि मन, वचन और कर्म से किसी भी जीव को कष्ट न पहुंचाना ही सबसे बड़ा धर्म है और जियो और जीने दो का सिद्धांत उनके जीवन का मूल था। उन्होंने भौतिक सुख-सुविधाओं और वस्तुओं के प्रति मोह का त्याग कर अपरिग्रह का मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी, क्योंकि परिग्रह ही सभी दुखों का मूल कारण है। इसके साथ ही, सत्य के अनेक पहलुओं को समझने और दूसरों के दृष्टिकोण का सम्मान करने के लिए उन्होंने अनेकांतवाद और स्याद्वाद का उपदेश दिया, जिससे समाज में समरसता और सहिष्णुता लाई जा सके। भगवान का यह शाश्वत संदेश है कि बाहर के शत्रुओं से लड़ने से पहले हर मनुष्य को अपने भीतर बैठे क्रोध, मान, माया और लोभ (कषायों) रूपी आंतरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।

संतों के सान्निध्य में धर्म प्रभावना

गर्भ कल्याणक के इस पावन अवसर पर मंदिरों और तीर्थ क्षेत्रों में विराजित पूज्य संतों, मुनिराजों और गणिनी आर्यिका माताजी के प्रवचन सुनने का स्वर्णिम अवसर मिलता है। उनके मुखारविंद से निकले भगवान वासुपूज्य के वैराग्यमयी जीवन के प्रसंग भक्तों के मन में नई ऊर्जा का संचार करते हैं। यह सत्संग हमें मोह-माया से परे जाकर आत्म-चिंतन करने और धर्म प्रभावना का पुण्य लाभ अर्जित करने की प्रेरणा देता है। तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य जी का गर्भ कल्याणक हमें आत्मकल्याण और विश्व-कल्याण दोनों का मार्ग प्रशस्त करता है। आषाढ़ कृष्ण षष्ठी के इस पावन पर्व पर हमें जिनालयों में जाकर प्रभु की आराधना करनी चाहिए और उनके द्वारा बताए गए वीतरागता, सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने का दृढ़ संकल्प लेना चाहिए। यही इस गर्भ कल्याणक पर्व को मनाने की सच्ची सार्थकता होगी।

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