श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर, पीपलगोन में अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्य सागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में भक्तामर महिमा मंडल संगीतमय विधान का भव्य आयोजन विधिवत संपन्न हुआ। इस अवसर पर पूज्य मुनिश्री पूज्य सागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचनों से उपस्थित जनसमूह को लाभान्वित किया। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
पीपलगोन। श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर, पीपलगोन में अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्य सागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में भक्तामर महिमा मंडल संगीतमय विधान का भव्य आयोजन विधिवत संपन्न हुआ। विधान का संचालन विधानाचार्य ब्रह्मचारी भावेश भैया द्वारा अत्यंत भावपूर्ण ढंग से किया गया।
मुख्य कलश स्थापना एवं इंद्र बनकर किया विशेष पूजन
विधान मंडप पर मुख्य कलश विराजमान करने का सौभाग्य डॉ. देवेंद्र धनोते को प्राप्त हुआ। अन्य चार पूज्य कलशों का सौभाग्य राजेश जैन, डॉ. महेन्द्र जैन, अतुल जैन एवं अंकित जैन को मिला। इस शुभ अवसर पर सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य डॉ. देवेंद्र धनोते को, ईशान इंद्र बनने का सौभाग्य अंकित जैन को, महेंद्र इंद्र बनने का सौभाग्य डॉ. महेन्द्र कुमार जैन को, सनत इंद्र एवं यज्ञ नायक बनने का सौभाग्य राजेश जैन व अनुमेहा जैन को प्राप्त हुआ।
स्थानीय श्रद्धालुओं की रही भागीदारी
इस भव्य धार्मिक आयोजन में पीपलगोन सहित आसपास के क्षेत्रों से अनेक श्रद्धालु व गणमान्य जन उपस्थित रहे। संगीतमय विधान में सभी श्रद्धालु भक्ति रस में सराबोर हो उठे।
पूज्य गुरुदेव के प्रवचन में जीवन का सार
कार्यक्रम के समापन अवसर पर पूज्य मुनिश्री पूज्य सागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचनों से उपस्थित जनसमूह को लाभान्वित किया। उन्होंने कहा कि पूजा से विनम्रता आती है। यदि पूजा करने के बाद अहंकार आ जाए, तो समझना चाहिए कि वह पूजा पाप का कारण बन सकती है। भगवान की पूजा करने के लिए पुण्य की आवश्यकता होती है — आज आपको जो यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है, वह आपके पुण्य का ही फल है। उदाहरण देते हुए मुनिश्री ने कहा कि रावण ने धर्म किया, परंतु उसमें अहंकार आ गया, जिससे उसका नाश हो गया। वहीं राम ने भी धर्म किया, परंतु विनम्रता बनाए रखी, इसलिए वे भगवान बन गए।













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