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अहंकार से नहीं, चरित्र से बनती है पहचान : अंशुल जैन शास्त्री ने कर्म और विनम्रता का दिया संदेश


द्रोणगिरी के जैन विद्वान अंशुल जैन शास्त्री ने अपने प्रेरक संदेश में कहा कि पद, प्रतिष्ठा और अधिकार से नहीं, बल्कि चरित्र, विनम्रता और श्रेष्ठ कर्मों से मनुष्य की वास्तविक पहचान बनती है। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट।


मुरैना/द्रोणगिरी। जैन विद्वान अंशुल जैन शास्त्री ने कहा कि मनुष्य जब संघर्ष करता है, तब वह विनम्र रहता है, लेकिन पद, प्रतिष्ठा और अधिकार मिलने के बाद यदि अहंकार आ जाए तो वह सही और गलत का भेद भूल जाता है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति चाहे संसार की नजरों से बच जाए, लेकिन अपने कर्मों के परिणामों से कभी नहीं बच सकता।

कर्मों का अटल नियम

अंशुल शास्त्री ने कहा कि मनुष्य की दो आंखें होती हैं, लेकिन उस पर समाज, समय, इतिहास और कर्म का नियम निरंतर दृष्टि रखे हुए हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने आचरण और व्यवहार में पारदर्शिता एवं नैतिकता बनाए रखनी चाहिए।

चरित्र ही वास्तविक पहचान

उन्होंने कहा कि वास्तविक महानता पद या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि चरित्र में होती है। जो व्यक्ति अपने अधिकार का उपयोग सेवा, न्याय और करुणा के लिए करता है, वही समाज में स्थायी सम्मान प्राप्त करता है। अधिकार का दुरुपयोग अंततः व्यक्ति के पतन का कारण बनता है।

सेवा और विनम्रता का संदेश

अंशुल शास्त्री ने कहा कि दूसरों को गिराकर कोई ऊंचा नहीं उठ सकता और किसी का अधिकार छीनकर स्थायी सुख प्राप्त नहीं किया जा सकता। समय का न्याय देर से अवश्य होता है, लेकिन न्याय अवश्य होता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को विनम्रता और संयम के साथ जीवन जीना चाहिए।

प्रेरक आह्वान

उन्होंने समाज से आह्वान किया कि पद मिले तो विनम्र बनें, प्रतिष्ठा मिले तो संयम रखें और अधिकार मिले तो उसका उपयोग सेवा, न्याय एवं मानवता के लिए करें। उन्होंने कहा कि जीवन का सबसे बड़ा पद मानवता, सबसे बड़ी प्रतिष्ठा चरित्र और सबसे बड़ी सफलता निर्मल अंतःकरण है।

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