आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने जयपुर जिले में ग्रीष्मकालीन प्रवास में काफी धर्म प्रभावना कर संघस्थ श्री हितेन्द्र सागर जी की जन्म धर्मनगरी बड़ के बालाजी जयपुर से गुरुवार सुबह 5.15 बजे 5.4 किमी विहार कर स्वप्नलोक सीतापुर बास संझरिया, जयपुर में आहार एवं रात्रि विश्राम के लिए 10 मुनिराज, 20 आर्यिका माताजी 1 ऐलक 4 क्षुल्लक, 1 क्षुल्लिका 36 साधुओं सहित मंगल विहार किया। जयपुर से पढ़िए, डॉ.राजेश पंचोलिया की खबर…
जयपुर। अभी ना जाएं छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं, बहता पानी रमता योगी रोके ना रुके। यह कहावत चरितार्थ हुई जब 36 मूलगुण धारी 36 साधुओं सहित पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने जयपुर जिले में ग्रीष्मकालीन प्रवास में काफी धर्म प्रभावना कर संघस्थ श्री हितेन्द्र सागर जी की जन्म धर्मनगरी बड़ के बालाजी जयपुर से गुरुवार सुबह 5.15 बजे 5.4 किमी विहार कर स्वप्नलोक सीतापुर बास संझरिया, जयपुर में आहार एवं रात्रि विश्राम के लिए 10 मुनिराज, 20 आर्यिका माताजी 1 ऐलक 4 क्षुल्लक, 1 क्षुल्लिका 36 साधुओं सहित मंगल विहार किया। समाज के सभी उम्र के भक्तों के नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी। चूड़ीवाल परिवार के अशोक, भागचंद, सुनील, सुनीता, कुसुम चूड़ीवाल, मॉर्निंग क्लब आदि अनेक समाज जन भाव विह्वल थे और उनके नेत्र सजल थे। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ससंघ 37 पिच्छिका का शुक्रवार को प्रातः विहार 5.15 बजे से 5.2 किमी स्वप्नलोक से श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, बेगस, जिला जयपुर में आहार और रात्रि विश्राम होगा।
संघ का जयपुर में अधिक समय तक रुकने का प्रारंभिक विचार नहीं था
आचार्यश्री ने सरल और प्रेरणादायक मार्गदर्शन दिया
आचार्य श्री ने प्रवचन में गुरु भक्ति, समाज की एकता, धर्म संरक्षण, संस्कार, सेवा और कृतज्ञता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अत्यंत सरल और प्रेरणादायक मार्गदर्शन दिया। जब समाज अपने अच्छे भावों को केवल मन में रखने के बजाय उन्हें कार्यरूप में बदलता है, तब बड़े-बड़े धर्मकार्य संपन्न हो जाते हैं। गुरु का सान्निध्य समाज में नई ऊर्जा और साहस पैदा करता है। अच्छी भावना तभी सार्थक है, जब वह सेवा और धर्मकार्य में बदल जाए। यह धर्म देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में प्रकट की।
जयपुर में अधिक समय तक रुकने का विचार नहीं था
सुरेश सबलावत भागचंद चूड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री ने कहा कि संघ का जयपुर में अधिक समय तक रुकने का प्रारंभिक विचार नहीं था, लेकिन समाज की श्रद्धा, विनय और गुरुभक्ति के कारण चार माह का अमूल्य सान्निध्य प्राप्त हुआ। सच्ची भक्ति गुरु कृपा को आकर्षित करती है। चूड़ीवाल परिवार ने अपनी माताजी की सम्मेद शिखर दर्शन की भावना को समाजोपयोगी रूप देने का प्रयास किया, ताकि अन्य लोग भी उसका लाभ ले सकें। माता-पिता की अधूरी धार्मिक भावनाओं को पूरा करना महान पुण्य है। बचपन में मिले संस्कार और धर्म की शिक्षा जीवन में कभी न कभी अवश्य फल देती है। वर्षों पहले बोया गया धर्म का बीज एक दिन विशाल वृक्ष बन जाता है।
आने वाली पीढ़ियों के लिए धर्म की मजबूत नींव तैयार करते हैं
आचार्य श्री ने अपने दीक्षा गुरु और शिक्षा गुरु के प्रति गहरी श्रद्धा व्यक्त करते हुए बताया कि वर्षों बाद भी गुरु स्मृति हृदय में जीवित रहती है। जीवन अनिश्चित है। इसलिए जब भी गुरु दर्शन, गुरु सेवा और गुरु वंदना का अवसर मिले, उसे टालना नहीं चाहिए। इन चार महीनों में जयपुर समाज ने तन, मन और धन से संघ की सेवा की। साधु-संघ की सेवा करना दुर्लभ पुण्य का कार्य है। साधु सेवा से आत्मा में विनय और पुण्य दोनों बढ़ते हैं। जो लोग साधु-संघ के लिए भवन, व्यवस्था और सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं, वे आने वाली पीढ़ियों के लिए धर्म की मजबूत नींव तैयार करते हैं। पूर्वजों ने मंदिरों, संस्कारों और धर्म परंपराओं को सुरक्षित रखकर जैन संस्कृति को जीवित रखा। अब उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हमारी है।
साधु-संघ की सेवा दुर्लभ पुण्य है
जब समाज संगठित होकर धर्म और संस्कृति के लिए कार्य करता है, तब असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। गुरु भक्ति जीवन को दिशा देती है। धर्म के लिए केवल भाव नहीं, पुरुषार्थ भी आवश्यक है। माता-पिता और गुरु की भावनाओं का सम्मान करें। बच्चों को धर्म और संस्कार अवश्य दें। साधु-संघ की सेवा दुर्लभ पुण्य है। मंदिर और धर्मस्थल हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं।समाज की उन्नति एकता, सेवा और श्रद्धा से होती है।













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