भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में आचार्यश्री शांतिसागर जी के समाधि दिवस पर मुनिराजों के सानिध्य में गुणानुवाद किया गया। पट्टाचार्य विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लकश्री श्रुतसागरजी महाराज के सानिध्य में आचार्यश्री को भावांजलि अर्पित की गई। नांद्रे से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटिल की यह खबर…
नांद्रे। भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में आचार्यश्री शांतिसागर जी के समाधि दिवस पर मुनिराजों के सानिध्य में गुणानुवाद किया गया। पट्टाचार्य विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लकश्री श्रुतसागरजी महाराज के सानिध्य में आचार्यश्री को भावांजलि अर्पित की गई। मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज कहा कि बीसवीं सदी के एक दूर-दृष्टा, अलौकिक व्यक्तित्व, वीतरागी श्रमण संस्कृती के उन्नायक सद्गुरु दिगंबराचार्य शांतिसागर जी ने विस्मृत मुनि मुद्रा से जनजन, उनके लिए दिगंबरत्व का तप, त्याग, संयम से प्रभाव दिखाकर अशांति, हिंसा आदि कर्माें में जीने वाले लोगों को शांति तथा अहिंसा की स्वमुद्रा से एवं स्व ज्ञानामृत वाणी से बोध कराकर वीतराग मार्ग पर श्रद्धा को स्थापित किया है।
मुनिश्री ने कहा कि आचार्य भगवंत शांतिसागर जी पंथ परंपराओं, अंध रूढियों से परे, विशद विचार, समीचीन सोच के धारक थे। वे एक ओजस्वी, तपस्वी साधक थे। या कहूं जन जन को सद्बोध देनेवाले आध्यात्मिक सद्गुरु, जिनकी विशेषता थी कि वह सभी को अपने लगते थे। आज आचार्य भगवंत की पुण्यतिथि का अवसर हमारे पाप पुण्य कारिणी विद्या का विनाश बने तथा निर्वाण प्राप्ति में सहयोग बने। यही मंगल भावना के साथ आचार्य भगवंत की सिद्ध श्रुत आचार्य भक्ति पूर्वक केवलज्ञान के ज्ञेय प्रमाण वंदना करता हूं।













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