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पुण्यवान को पीछे मत बैठाना, कभी पीठ मत दिखाना: मुनिश्री सुधासागर जी ने धर्मसभा में पुण्य कर्म के बारे में समझाया 


मुनिश्री सुधासागर जी ने यहां धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जब जब व्यक्ति पर का घात करेगा। उसके पुण्य का उदय होगा, तभी परघात कर सकता है, चाहे मन-वचन-काय से दूसरों का घात करें, चाहे कृत-कारित-अनुमोदना से करें। अशोकनगर से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…


अशोकनगर। मुनिश्री सुधासागर जी ने यहां धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जब जब व्यक्ति पर का घात करेगा। उसके पुण्य का उदय होगा, तभी परघात कर सकता है, चाहे मन-वचन-काय से दूसरों का घात करें, चाहे कृत-कारित-अनुमोदना से करें। जब भी व्यक्ति दूसरे का नाश करेगा, उस नाश के लिए पुण्य का उदय चाहिए। उन्होंने कहा कि पुण्यकर्म के उदय के बिना व्यक्ति दूसरों को दुख नहीं दे सकता। यदि कोई व्यक्ति किसी का बुरा सोच रहा है, गाली दे रहा है, थप्पड़ मार रहा है तो उसके पुण्य का उदय है। हा ये बात अलग है जब जब व्यक्ति पुण्य के उदय को भोक्ता है तो उसे पापकर्म का बंध होता है। जैनाचार्यों ने कहा-पुण्य के उदय से डरों, सबसे ज्यादा दुर्गति कराने वाला है पुण्य। देवताओं के पुण्य का उदय होता है तो मरकर वे एकेंद्रीय बन जाते हैं। अपनी जिंदगी में कभी पुण्य का उदय आवे उस समय तुम्हें सावधान रहना है, अच्छे दिन तुम्हें सावधानी से गुजारना है क्योंकि सारा संसार पुण्य के उदय में पाप करता है।

जिंदगी भर का किया हुआ पुण्य भस्म हो जाएगा

पुण्यवान को कभी पीछे मत बैठाना, किसी भी क्षेत्र में, धर्म के क्षेत्र में यदि तुमसे बड़ा है उसको कभी पीठ मत दिखाना, तुम पहले से आकर बैठ गए तो उसके आते ही खड़े हो जाना, तुम पीछे हो जाना क्योंकि वह धर्म में तुमसे आगे है। जो तुमसे धर्म में अधिक है, यदि जान करके तुमने उसको पीछे बैठाला, पीठ दिखाई, उसके आते ही खड़े नहीं हुए, वेलकम नहीं किया तो उसी क्षण जिंदगी भर का किया हुआ पुण्य भस्म हो जाएगा। मात्र एक क्षण के लिए तुमने तुमसे बड़े धर्मात्मा का अनादर किया है। तुमसे अधिक व्रती है, गुणवान है, तपस्वी है। धर्मात्मा यदि दूर से दिख जाए तो आंखों से विनय चालू कर दो, जहाँ से दिख जाए वहीं से तुरन्त खड़े होकर आंखों से विनय चालू करना है, नेत्र विनय, नेत्र प्रणाम, भले वो एक कि.मी. दूर क्यों न हो।

जिसके पास जो दुर्गुण हो, उसको छोड़ने की विधि बता रहा हूँ

एक मिनट भी पहले जिसकी दीक्षा हुई है वो सब तुमसे बड़े में आएंगे, जो इसमे प्रमाद करता है, वह अपनी सारी शक्तियों को खो देता है और जैसे ही तुमने ये चालू किया, जो चीज उसके पास है तुम्हारे पास नहीं है, जब तक वो यहाँ तक आया, तब तक तुम्हारा भंडारा भर जाएगा, एक दिन तुम भी उस जैसे बन जाओगे क्योंकि आपने उसका वेलकम किया। आप गुटखा खाते हैं, दूसरा नहीं खाता है, यदि वह आपके पीछे बैठा हो तो थोड़ा उठ करके आगे कर लेना, तुम पीछे हो जाना, एक दिन तुम्हारा गुटखा खाना छोड़ जाएगा। जिसके पास जो दुर्गुण हो, उसको छोड़ने की विधि बता रहा हूँ।

भगवान के सामने बुलावे का इंतजार करते हैं

दो स्थानों पर कभी बुलावे का इंतजार मत करना, कभी मान मत करना, मुझे तो बुलाया ही नहीं गया, पूछा ही नहीं गया, मैं कैसे जाऊँ। एक तो जब पंचपरमेष्ठी के पास जाने की बात हो, उनके प्रवचन, उनके दर्शन की बात हो, भगवान अथवा गुरु की बात हो। कभी ऐसा भाव आ गया तो ऐसा कर्म का बंध होगा कि तुम ऐसे कुलहीन परिवार में जन्मोंगे, जहाँ कुलाचार भी नहीं होगा। नीच कुल में कौन जन्मता है, ये वही लोग हैं जो बड़े लोगों के सामने, भगवान के सामने बुलावे का इंतजार करते हैं। महाराज की सेवा इसलिए मत करना कि मैं पदाधिकारी हूँ, जब भी गुरु के पास जो श्रावक बनकर जाना। अध्यक्ष मैं व्यवस्थाओं के लिए हूँ, भगवान या गुरु के चरणों मे सेवक बनकर जाना। दान में किसी के कहने का इंतजार मत करना, दान जब स्वयं अंतरात्मा से बोले, कोई कहे या ना कहे मुझे तो मंदिर बनाना है, बिना कहे अंदर से आओ। दूसरा घर में माँ-बाप हैं कभी उनके बुलावे का इंतजार मत करना, वे गृहस्थ में पूज्य है।

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