आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज का 153वां जन्म जयंती महोत्सव मंगलवार को पूरे देश में पूर्ण भक्तिभाव से मनाया जा रहा है। आषाढ़ वदी छठ को आपका अवतरण दिवस आता है। जैन समाज के लिए आचार्यश्री शांतिसागर जी ने कई प्रतिमान रचे और उनपर चलने के लिए प्रेरित किया। आपकी संयम यात्रा अनुकरणीय है। इस अवसर पर इंदौर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह विस्तृत रिपोर्ट…
इंदौर। दिगंबर साधु संत परम्परा में वर्तमान युग में अनेक तपस्वी, ज्ञानी ध्यानी संत हुए। उनमें आचार्य शांतिसागरजी महाराज एक ऐसे प्रमुख साधु श्रेष्ठ तपस्वी रत्न हुए हैं। जिनकी अगाध विद्वता, कठोर तपश्चर्या, प्रगाढ़ धर्म श्रद्धा, आदर्श चरित्र और अनुपम त्याग ने धर्म की यथार्थ ज्योति प्रज्वलित की। आपने लुप्तप्राय, शिथिलाचारग्रस्त मुनि परम्परा का पुनरुद्धार कर उसे जीवंत किया, यह निग्रन्थ श्रमण परम्परा आपकी ही कृपा से अनवरत रूप से प्रथम पट्टाचार्य श्री वीरसागर जी, द्वितीय पट्टाचार्य श्री शिवसागर जी, तृतीय पट्टाचार्य श्री धर्मसागर जी, चतुर्थ पट्टाचार्य श्री अजित सागर जी तथा पंचम पट्टाचार्य , आचार्य श्री वर्धमान सागर के रूप मेंआज तक प्रवाहमान है।
जन्म –
दक्षिण भारत के प्रसिद्ध नगर बेलगांव जिला चिकोड़ी तालुका (तहसील) में भोजग्राम है। भोजग्राम के समीप लगभग चार मील की दूरी पर विद्यमान येलगुल गांव में नाना के घर आषाढ़ कृष्णा 6 विक्रम संवत् 1929 सन् 1872 बुधवार की रात्रि में शुभ लक्षणों से युक्त बालक सातगौड़ा का जन्म हुआ था। गौड़ा शब्द भूमिपति-पाटिल का द्योतक है। पिता भीमगौड़ा और माता सत्यवती के आप तीसरे पुत्र थे इसी से मानो प्रकृति ने आपको रत्नत्रय और तृतीय रत्न सम्यकू चारित्र का अनुपम आराधक बनाया।
बचपन-
सातगौड़ा बचपन से ही वैरागी थे। लौकिक आमोद-प्रमोद से सदा दूर रहते थे। बाल्यकाल से ही वे शांति के सागर थे। छोटी सी उम्र में ही आपके दीक्षा लेने के परिणाम थे परन्तु, माता-पिता ने आग्रह किया कि बेटा जब तक हमारा जीवन है तब तक तुम दीक्षा न लेकर घर में धर्मसाधना करो। इसलिए आप घर में रहे।
व्यवसाय-
मुनियों के प्रति उनकी अटूट भक्ति थी। वे अपने कंधे पर बैठाकर मुनिराज को दूधगंगा तथा वेदगंगा नदियों के संगम के पार ले जाते थे। वे कपड़े की दुकान पर बैठते थे तो ग्राहक आने पर उसी से कहते थे कि-कपड़ा लेना है तो मन से चुन लो, अपने हाथ से नाप कर फाड़ लो और बही में लिख दो। इस प्रकार उनकी निस्पृहता थी। आप कभी भी अपने खेतों में से पक्षियों को नहीं भगाते थे। बल्कि खेतों के पास पीने का पानी रखकर स्वयं पीठ करके बैठ जाते थे। फिर भी आपके खेतों में सबसे अधिक धान्य होता था। वे कुटुंब के झंझटों में नहीं पड़ते थे। उन्होंने माता-पिता की खूब सेवा की और उनका समाधिमरण कराया।
संयम पथ-
माता-पिता के स्वर्गस्थ होते ही आप गृह विरत हो गये एवं मुनिश्री देवप्पा स्वामी से 41 वर्ष की आयु में कर्नाटक के उत्तूर ग्राम में ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी सन् 1915को क्षुल्लक के व्रत अंगीकार किए। आपका नाम शांतिसागर रखा गया। क्षुल्लक अवस्था में आपको कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था, क्योंकि तब मुनिचर्या शिथिलताओं से परिपूर्ण थी। साधु आहार के लिए उपाध्याय द्वारा पूर्व निश्चित गृह में जाते थे। मार्ग में एक चादर लपेटकर जाते थे आहार के समय उस वस्त्र को अलग कर देते थे आहार के समय घण्टा बजता रहता था जिससे कोई विध्न न आए। क्षुल्लक जी ने इस प्रक्रिया को नहीं अपनाया और आगम की आज्ञानुसार चर्या पर निकलना प्रारम्भ किया। गृहस्थों को पड़गाहन की विधि ज्ञात न होने से वे वापस मंदिर में आकर विराज जाते इस प्रकार निराहार 4 दिन व्यतीत होने पर ग्राम में तहलका मच गया तथा ग्राम के प्रमुख पाटील ने कठोर शब्दों में उपाध्याय को कहा-शास्त्रोक्त विधि क्यों नहीं बताते? क्या साधु को निराहार भूखा मार दोगे! तब उपाध्याय ने आगमोक्त विधि बतलाई एवं पड़गाहन हुआ
ऐलक दीक्षा
नेमिनाथ भगवान के निर्माण स्थान गिरनार जी की वंदना के पश्चात् इसकी स्थायी स्मृति रूप अपने ऐलक दीक्षा ग्रहण की। ऐलक रूप में आपने नसलापुर में चतुर्मास किया। वहां से चलकर ऐनापुर ग्राम में रहे।
मुनि दीक्षा
उस समय यरनाल में पंचकल्याणक महोत्सव (सन् 1920) होने वाला था। वहां जिनेन्द्र भगवान के दीक्षा कल्याणक दिवस पर आपने अपने गुरुदेव देवेन्द्रकीर्ति जी से फागुन शुक्ला चतुर्दशी 24 मार्च सन 1920 को मुनि दीक्षा ग्रहण की। सन 2020 में यरनाल मुनि दीक्षा स्थली पर पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में मुनि दीक्षा का शताब्दी वर्ष मनाया गया।
आचार्य पद
समडोली में श्री नेमिसागर जी की ऐलक दीक्षा व श्री वीरसागर जी की मुनि दीक्षा के अवसर पर समस्त संघ ने महाराज को आचार्य पद (सन् 1924) से अलंकृत कर अपने आप को कृतार्थ किया।
चारित्र चक्रवति
गजपंथा में चतुर्मास के बाद सन् (1934) पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ। इस अवसर पर उपस्थित धार्मिक संघ ने महाराज को चारित्र चक्रवर्ती पद से अलंकृत किया।
संल्लेखना-
जीवन पर्यन्त मुनिचर्या का निर्दाेष पालन करते हुए 84 वर्ष की आयु में दृष्टि मंद होने के कारण संल्लेखना की भावना से आचार्य श्री सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरी जी पहुंचे। वहां पर उन्होंने 13 जून को विशाल धर्मसभा के मध्य आपने संल्लेखना धारण करने के विचारों को अभिव्यक्त किया। 15 अगस्त को महाराज ने आठ दिन की नियम-संल्लेखना का व्रत लिया। जिसमें केवल पानी लेने की छूट रखी। 17 अगस्त को उन्होंने यम संल्लेखना या समाधिमरण की घोषणा की तथा 24 अगस्त को अपना आचार्य पद अपने प्रमुख शिष्य श्री वीरसागर जी महाराज को प्रदान कर घोषणा पत्र लिखवाकर जयपुर (जहां मुनिराज विराजमान थे) पहुंचाया। आचार्य श्री ने 36 दिन की सल्लेखना में केवल 12 दिन जल ग्रहण किया।
18 सितम्बर 1955 को प्रातः 6.50 पर ओम सिद्धोऽहं का ध्यान करते हुए युगप्रवर्तक आचार्यं श्री शांतिसागर जी ने नश्वर देह का त्याग कर दिया। संयम-पथ पर कदम रखते ही आपके जीवन में अनके उपसर्ग आये जिन्हें समता पूर्वक सहन करते हुए आपने शांतिसागर नाम को सार्थक किया।
साधु जीवन में सर्प ,शेर आदि के अनेक उपसर्ग हुए। आचार्यश्री का कहना था कि भय किस बात का? यदि वह पूर्व का बैरी न हो और हमारी ओर से कोई बाधा या आक्रमण न हो तो वह क्यों आक्रमण करेगा? बिना किसी भय के आत्मलीन रहते थे। चींटियों का, मकोड़े का, पागल व्यक्ति द्वारा प्रहार सहित अनेक उपसर्ग आपने शांति के सागर बन कर साम्य भाव से सहन किए। आचार्य श्री ने गृहस्थ अवस्था 18 वर्ष में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लिया कम उम्र 25 वर्ष में जूते तथा बिस्तर का त्याग कर दिया। 32 वर्ष की आयु में घी-तेल का आजीवन त्याग कर दिया था, उनके नमक, शक्कर, छाछ आदि का भी त्याग था। उन्होंने 35 वर्ष के मुनि जीवन में 27 वर्ष 3 माह 23 दिन उपवास किए। कुल 9938 उपवास किए
अन्नाहार का त्याग
बम्बई सरकार ने हरिजनों के उद्धार के लिए एक हरिजन मंदिर प्रवेश कानून सन् 1947 में बनाया। जिसके बल पर हरिजनों को जबरदस्ती जैन मंदिरों में प्रवेश कराया जाने लगा। जब आचार्य श्री को यह समाचार ज्ञात हुआ तो उन्होंने इसे जैन संस्कृति, जैन धर्म पर आया उपसर्ग जानकर, जब तक यह उपसर्ग दूर नहीं होगा तब तक के लिए अन्नाहार का त्याग कर दिया। आचार्य श्री की श्रद्धा एवं त्याग के परिणाम स्वरूप लगभग तीन वर्ष पश्चात इस कानून को हटा दिया गया। तभी आचार्य श्री ने 1105 दिन के बाद 16 अगस्त 1951 रक्षाबंधन के दिन अन्नाहार को ग्रहण किया। दिल्ली में दिगम्बर मुनियों के उन्मुक्त विहार की सरकारी आज्ञा नहीं थी। अतः 10-20 आदमी हमेशा महाराज के विहार के वक्त साथ ही रहते थे। आचार्य महाराज को चतुर्मास के दो माह व्यतीत होने पर जब यह बात ज्ञात हुई तो महाराज ने स्वयं एक फोटोग्राफर को बुलवाया और ज्ञात समय के पूर्व अकेले ही शहर में निकल गए तथा जामा मस्जिद, लालकिया, इंडिया गेट, संसद भवन आदि प्रमुख स्थानों पर खड़े होकर उन्होंने अपना फोटो खिचवाया। समाज में अपवाद होने लगा कि महाराज को फोटो खिचवाने का शौक है। इस विषय में महाराज से पूछे जाने पर उन्होंने ने कहा-हमारे शरीर की स्थिति तो जीर्ण अधजले काठ के समान है। इसके चित्र की हमें क्या आवश्यकता और वह चित्र हम कहां रखेंगे। श्रावकों का कर्तव्य है कि इन चित्रों को सम्हाल कर रखें। जिससे भविष्य में मुनि विहार की स्वतंत्रता का प्रमाण सिद्ध हो सके। हमारे इस उद्योग से सभी दिगम्बर जैन मुनियों में साहस आएगा, दिगंबर जैनधर्म की प्रभावना होगी। हमारे ऊपर उपसर्ग भी आए तो हमें कोई चिंता नहीं। अच्छे कार्य करते हुए भी यदि अपवाद आये तो उसे सहना मुनि धर्म है न कि उसका प्रतिवाद करना।
आगम ग्रन्थों की सुरक्षा को दृष्टि में रखते हुए आचार्य श्री के आशीर्वाद एवं प्ररेणा से सिद्धांत ग्रंथों को ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण कराया गया। अनेकों भव्य आत्माओं ने आचार्य श्री से व्रत-संयम ग्रहण कर अपने जीवन का उद्धार किया।
दीक्षित शिष्य
1 मुनि 26
2 आर्यिका 4
3 ऐलक 16
4 क्षुल्लक 28
5 क्षुल्लिका 14
योग 88
गुरुणा गुरु
श्री सात गोड़ा जी ने सन 1915 में मुनि श्री देवेंद्र कीर्ति जी से क्षुल्लक दीक्षा तथा वर्ष 1920 में मुनि दीक्षा ली थी आप सन 1924 में आपका चतुविद संघ होने से आपको आचार्य बनाया गया आपकी आगम अनुरूप चर्या देख कर दीक्षा गुरु श्री देवेंद्र कीर्ति जी ने आपसे पुनः मुनि दीक्षा ली इस कारण आपको गुरुणा गुरु कहा जाता है। वर्ष 1925 में आप श्री श्रवण बेलगोला महामस्तकाभिषेक में भी शामिल हुए थे।













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