मुरैना के बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में आचार्य श्री उदारसागरजी महाराज ने संतों के सान्निध्य को आत्मजागरण का माध्यम बताया। मुनि श्री उपशांत सागरजी ने धर्म को व्यवहार में उतारने का संदेश दिया। पढ़िए श्रीफल साथी मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट।
मुरैना। वर्षायोग के पावन अवसर पर बड़े जैन मंदिर में आयोजित विशाल धर्मसभा में दिगम्बर जैनाचार्य 108 श्री उदारसागरजी महाराज ने कहा कि जिस प्रकार आकाश में घिर आए मेघों को देखकर मयूर आनंद से नृत्य करने लगता है, उसी प्रकार साधु-संतों के दर्शन एवं सान्निध्य से धर्मात्मा का हृदय भक्ति, श्रद्धा और आत्मिक आनंद से भर उठता है। यह आनंद किसी सांसारिक उपलब्धि से नहीं, बल्कि आत्मा की पवित्र अनुभूति से प्राप्त होता है।
संतों का आगमन आत्मजागरण का महापर्व
आचार्यश्री ने कहा कि प्रकृति हर क्षण जीवन का गूढ़ संदेश देती है। जैसे वर्षा मयूर के लिए नवजीवन का संदेश लेकर आती है, वैसे ही संतों का आगमन आत्मा के जागरण का महापर्व है। संतों के दर्शन से मनुष्य के भीतर सुप्त पड़े सद्गुण जागृत होने लगते हैं और उसका जीवन धर्ममय बनता है।
त्याग, तप और संयम ही सच्ची संपत्त
आचार्य श्री उदारसागरजी महाराज ने कहा कि दिगम्बर साधु त्याग, तप, संयम और वैराग्य की जीवंत प्रतिमूर्ति हैं। जिन्होंने सांसारिक वैभव का त्याग कर आत्मकल्याण का मार्ग अपनाया है, उनका जीवन स्वयं एक धर्मग्रंथ है। उन्होंने कहा कि बाहरी सुख-सुविधाएं केवल सुविधा दे सकती हैं, लेकिन आत्मिक शांति धर्म और संतों के सान्निध्य से ही प्राप्त होती है।
धर्म को व्यवहार में उतारने का संदेश
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री उपशांत सागर महाराज ने कहा कि यदि समाज में शांति, सद्भाव और नैतिकता स्थापित करनी है तो संतों की वाणी को केवल सुनना ही नहीं, बल्कि उसे जीवन में उतारना भी आवश्यक है। सत्य, अहिंसा, क्षमा, दया और ईमानदारी का पालन ही वास्तविक धर्म है।
संतों का सान्निध्य बदल देता है जीवन
मुनिश्री ने कहा कि आज परिवारों और समाज में बढ़ती अशांति का प्रमुख कारण धर्म से दूरी है। जब व्यक्ति संयम, सहनशीलता और आत्मचिंतन को अपनाता है, तब उसका जीवन सुखमय एवं समाजोपयोगी बन जाता है। संतों का सान्निध्य आत्मा की ओर लौटने की प्रेरणा देता है।
श्रद्धालुओं ने लिया धर्मलाभ
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने आचार्य श्री उदारसागरजी महाराज एवं मुनि श्री उपशांत सागर महाराज के प्रेरणादायी प्रवचनों का श्रवण कर धर्मलाभ प्राप्त किया तथा संतों के बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।













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