विशुद्धसागर महाराज जी के शिष्य सारस्वत सागर जी, जयंत सागर जी, सिद्ध सागर जी और श्रुतसागर महाराज जी का इंदौर से नांद्रे की ओर विहार शुरु है। 500 किमी की दुरी शेष है। विशुद्धसागर महाराज जी के शिष्य मुनिश्री सिद्ध सागर महाराज ने कहा की समय परिवर्तनशील है, काल परिवर्तित होते है और धर्म सार्थी के रूप में महान पुरुष धर्मस्थ को प्रवाहित करते रहते हैं। धूळे से पढ़िए, यह अभिषेक पाटील की यह खबर…
धुळे। विशुद्धसागर महाराज जी के शिष्य सारस्वत सागर जी, जयंत सागर जी, सिद्ध सागर जी और श्रुतसागर महाराज जी का इंदौर से नांद्रे की ओर विहार शुरु है। 500 किमी की दुरी शेष है। विशुद्धसागर महाराज जी के शिष्य मुनिश्री सिद्ध सागर महाराज ने कहा की समय परिणमनशील है, काल परिवर्तित होते है और धर्म सार्थी के रूप में महान पुरुष धर्मस्थ को प्रवाहित करते रहते हैं। इनकी पुण्य वर्गणाआंे से शिथिल हुआ धर्मरथ गति प्राप्त करता है और अनेकों जीव चल पड़ते हैं भगवत्ता प्राप्त करने के लिए। सम्प्रति मे ऐसे ही महापुरुष आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने आकाश सम धर्म को विस्तार प्रदान किया। गुरुदेव का जन्म मध्यप्रदेश के भिंड जिला के रूर ग्राम में हुआ। यह वही भिंड है, जिसे कभी डाकुआंे के शहर के नाम से जाना जाता था लेकिन जब से आचार्य का जन्म हुआ। उनकी पुण्य वर्गणाआंे के प्रभाव से अब यह शहर साधूओं की नगरी के नाम से संपुर्ण भारत में प्रसिद्ध है। इस नगर से अनेकों मुनि आर्यिका और व्रती बन चुके हैं। मेरा सौभाग्य रहा जिस ग्राम रूर में जिस परिवार में आचार्य श्री विशुद्धसागर महाराज जी का जन्म हुआ। उसी घर में मेरा भी जन्म हुआ।
समयसार, प्रवचनसार पर भव्य जीवों के लिए देशना प्रदान की
बुंदेलखंड में कहते है पूत के लक्षण पालन में दिख जाते हैं। आचार्य श्री बचपन से ही धार्मिक प्रवृित्त के रहे, घर में रहते थे तब ही अल्प आयु में समयसार जैसे महान ग्रंथ का स्वाध्याय करते थे। आचार्य श्री कि माता को गुरुजी के जन्म के पहले क्षेत्र वंदना करने के भाव आते थे। स्वप्न में मुनीराज के दर्शन होते थे। यही महान आत्मा के आगमन के शुभ चिन्ह कहलाता है। 16 वर्ष कि अल्प आयु में ही गणाचार्य विरागसागर महाराज से दीक्षा धारण कर अध्यात्म के सरोवर में प्रवेश कर ऐसी डुबकी लगाई कि फिर कभी आचार्य श्री ने पीछे नहीं देखा। समयसार, प्रवचनसार जैसे महान ग्रंथों पर भव्य जीवों के लिए देशना प्रदान कर जिनशासन को अध्यात्म सरोवर में डुबकी लगवा दी। स्वयं अध्यात्म योगी विशेषण से सुशोभित हुए। वर्तमान काल में नमोस्तु शासन को जयवंत करते हुए आचार्य श्री ने हजारांे युवाओं को धर्म मार्ग पर लगाया। सैकडों को व्रती बनाया और 70 युवाआंे को जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान कर जिनशासन को वर्धमान किया। गणाचार्य विराग सागर जी ने अपने 550 शिष्यों को आपकी योग्यता देखकर अपनी समाधी के पूर्व आपको अपना पट्टाचार्य पद नियुक्त किया। यही मंगल भावना आप स्वास्थ्य रहे, आपकी आयु दीर्घ हो, आप ऐसे ही नमोस्तु शासन को जयवंत करें। जिस प्रकार घर कि शोभा माँ से होती है। उसी प्रकार इस जिनशासन कि शोभा गुरुवर आपसे है।













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