दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -99 बिना सच्चे प्रेम के कोई भी संबंध टिकाऊ नहीं हो सकता : धर्म भीतर से, प्रेम और समर्पण से फलित होता है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 99वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


कबीर प्रेम न चक्खिया, चक्खि न साव।

सुने घर का पाहुना, ज्यूँ आया त्यूँ जाव॥


इस दोहे में कबीर दास कहते हैं कि जिसने सच्चे प्रेम को नहीं चखा, वह प्रेम के वास्तविक स्वरूप को कभी नहीं समझ सकता। यहां “चक्खिया” यानी चखना, अनुभव करना — यह केवल सुनने या बोलने का विषय नहीं है, बल्कि प्रेम को आत्मा से जीने का अनुभव है।

ऐसे लोग जो केवल प्रेम की बातें करते हैं लेकिन उसे आत्मा से नहीं जीते, वे कबीर के अनुसार “सुने घर के पाहुने” जैसे हैं — जो बिना किसी अपनत्व या जुड़ाव के आए और वैसे ही चले गए। उनका प्रेम क्षणिक, सतही और बनावटी होता है।

यह दोहा केवल सांसारिक प्रेम पर नहीं, बल्कि ईश्वर-प्रेम, भक्ति और आत्मिक अनुभव की ओर संकेत करता है। कबीर यहां हमें चेतावनी देते हैं कि धर्म केवल बाहरी क्रियाओं और दिखावे से नहीं, बल्कि भीतर से, प्रेम और समर्पण से फलित होता है। जो व्यक्ति केवल पूजा-पाठ, व्रत या आडंबर करता है लेकिन भीतर से प्रेमरहित है, वह ईश्वर तक नहीं पहुंच सकता।

आज के समाज में यह दोहा और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। बहुत से लोग संबंधों में प्रेम का दिखावा करते हैं, लेकिन उन संबंधों की नींव स्वार्थ और औपचारिकता पर होती है। ऐसे संबंध कबीर के ‘पाहुने’ जैसे हैं — टिकते नहीं, आत्मा को छूते नहीं। कबीर स्पष्ट करते हैं कि बिना सच्चे प्रेम के कोई भी संबंध गहरा या टिकाऊ नहीं हो सकता।

सच्चा प्रेम केवल लेना नहीं, निस्वार्थ देना, अपनाना और समर्पण है। ईश्वर के साथ संबंध भी तभी बनता है जब मन निष्कलुष, प्रेममय और समर्पित हो।

दोहा का आध्यात्मिक अर्थ

यह दोहा आत्मा की परमात्मा से एकता की ओर इशारा करता है। कबीर कहते हैं कि जब तक जीव प्रेम के वास्तविक स्वाद को नहीं चखता, वह जीवन के गहरे रहस्यों और परमात्मा की अनुभूति से वंचित रहता है। केवल शास्त्र पढ़ने, प्रवचन सुनने या धार्मिक अनुष्ठानों से मुक्ति नहीं मिलती — मुक्ति केवल प्रेम में डूबने से मिलती है।

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