समाचार

आत्मसिद्धि के सामने संसार की कोई सिद्धि बड़ी नहीं हो सकतीः मुनि श्री सुधासागर जी ने अपने प्रवचन में दिए महत्वपूर्ण संदेश


मुनिश्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों कटनी क्षेत्र के बहोरीबंद तीर्थ में प्रवचन कर रहे हैं। उन्होंने सोमवार को समयसार का महत्व बताया। महाराजश्री के प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…


कटनी। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जब व्यक्ति असमर्थ होता है तो उसे बहुत कुछ करने का भाव आता है और जब व्यक्ति समर्थ होता है तो उसे सोने का या नहीं करने का भाव आता है। पूज्य कुंदकुंद स्वामी ने बार-बार पुण्य से बचने को कहा है। व्यक्ति पाप कर्म से तो डरता है कि मेरे जीवन में अशुभकर्म का उदय न आए लेकिन, कोई शुभ कर्म से नही डरता, ये सबसे बड़ी कमजोरी है। गरीबी से डरता है, अमीरी से नहीं डरता, अंधा होने से डरता है, नेत्रवान होने से नहीं डरता। जिसकी शादी नहीं हुई वो दुःखी हो रहा है लेकिन, जिसको अच्छी पत्नी मिली, वो दुःखी नहीं हो रहा है। हम अशुभकर्माे में दुःखी हुए, कभी पुण्यकर्म में दुःखी नहीं हुए, इसलिए आज तक अपना कल्याण नहीं हुआ।

समयसार में आत्मसिद्धि बताई

जो प्रकृति के, काल के, किस्मत के भरोसे रहते हैं, वो कभी जिंदगी में विकास नहीं कर सकते। सामने वाला इतना हावी है कि मैं कुछ नहीं कर सकता, ऐसा भाव तुम्हें आ जाए तो तुम कुछ काम के नहीं हो, तुम्हारा डाउन फॉल चालू हो जाएगा। जब-जब तुम्हें लगे कि कोई ऊपरी बाधा है, समझ लेना तुम्हारी सारी शक्तियां खत्म हो गई। जब-जब तुम निमित्त बुद्धि या पर बुद्धि लाए, तुम्हारा आत्मा का सबकुछ नाश हो जाता है। समयसार में आत्मसिद्धि बताई- आत्मा को वश में करो। आत्मसिद्धि के सामने संसार की कोई सिद्धि बड़ी नहीं हो सकती। जो सिद्धि अपनी आत्मा में है, जो मैं कर सकता हूं। मेरा काम सारी दुनिया मिलकर आ जाए तो भी नहीं कर सकती। सारी दुनिया मुझे सुखी-दुःखी नहीं कर सकती। समयसार पढ़ने वाले को मौत भी दुखी नहीं कर सकती।

याद रखना रास्ता स्वयं बदनाम नहीं होता, रास्ता बदनाम होता

लोगों ने देखा कि जब तक समयसार नही पढ़ते थे तब तक वे लोग मुनियों के लिए चौका लगाते थे, जिनेंद्र भगवान की पूजा करते थे लेकिन, देखा कि समयसार पढ़ने के बाद इनमे ये परिवर्तन आने लगा कि मुनियों को आहार देना, पूजा करना ये व्यवहार है, जड़ की क्रिया है, ये मानकर छोड़ दिया तो तब से लोगों ने संस्था विशेष से छपे समयसार को मंदिरों से बाहर निकाल दिया। याद रखना रास्ता स्वयं बदनाम नहीं होता, रास्ता बदनाम होता है रास्ते पर चलने वालों के कारण। यदि मुनियों को आहार देना व्यवहार की क्रिया है तो क्यों न मुनि स्वयं आहार बनाने लगे? 187 दिन तक ऋषभदेव घूमते रहे तीन अंजुली रस के लिए, उस समय जंगलों में गन्ने अपने आप होते थे, रस स्वयं अपने आप टपकता था, अंजुली लगाकर स्वयं से ले लेते, बेवजह परेशान हुए। क्यों नही किया? कैसा है जैनधर्म, 187 दिन घूमते रहे लेकिन, जब तक श्रावक नवधाभक्ति पूर्वक नहीं देगा, जिंदगी भर निराहार रह जाएगा, दिगंबर मुनि लेकिन, अपने हाथ से आहार ग्रहण नहीं करेगा।

आप लोगों को धर्म की क्रिया में आगे बढ़ना चाहिए

मैं तुमसे वादा करता हूं कि समयसार को मंदिरों में फिर से उच्चासन दिलवाऊंगा, बस एक काम तुम लोग कर लो, जितना जितना तुम लोग समयसार पढो, उतना उतना आप लोगों को धर्म की क्रिया में आगे बढ़ना चाहिए। अभी दर्शन करते थे, अब पूजा अभिषेक करना। अभी रात में पानी पीते थे, अब वो भी छोड़ देना। मुनियों को तो छोड़ो त्यागी व्रतियों का भी सम्मान करना, यदि समयसार को चाहते हो तो इतना बलिदान दे दो क्योंकि, समयसार के बहिष्कार का मूल कारण है समाज का बिगड़ना तो तुम बस सन्मार्ग पर आकर दिखा दो। अपने पूज्य समयसार ग्रंथ के लिए इतना तो तुम कर ही सकते हो।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

You cannot copy content of this page