राजस्थान के संत समाचार

राजस्थान के जैन संत 19 भट्टारक जगतकीर्ति ने साहित्य और प्रतिष्ठाओं के माध्यम से अलख जगाई: इनकी विद्वत्ता के चलते कई श्रावक बने अनुयायी


राजस्थान में आलोच्य समय में 1450 से 1750 तक सैकड़ों जैन संत हुए। जिन्होंने अपने महान व्यक्तित्व से देश, समाज और साहित्य की सेवा में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। यहां हमने राजस्थान के चुनिंदा जैन संतों के बारे में परिचय देने का यह उपक्रम किया है। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 19वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक जगतकीर्तिजी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..


इंदौर। जगतकीर्ति अपने समय के प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय भट्टारक रहे हैं। ये संवत 1733 में सुरेंद्रकीर्ति जी के बाद भट्टारक बने। इनका पट्टाभिषेक आमेर में हुआ था। जहां आमेर और सांगानेर एवं अन्य नगरों के बड़ी संख्या में श्रावकों ने इन्हें अपना गुरु स्वीकार किया था। तत्कालीन पंडित रत्नकीर्ति, महीचंद और यशःकीर्ति ने इनका समर्थन किया। ये शास्त्रों के ज्ञाता एवं सिद्धांत ग्रंथों के गंभीर विद्धान थे। मंत्र शास्त्र में भी इनका अच्छा प्रवेश था। जगतकीर्ति लंबे समय तक भट्टारक रहे और इन्होंने अपने इस काल को राजस्थान में जगह-जगह विहार करके जन साधारण के जीवन को सांस्कृतिक, साहित्यिकक और धार्मिक दृष्टि से उच्च बनाया। संवत 1741 में आपने लवाण जयपुर गांव में विहार लिया। उस समय यहां के एक श्रावक हरनाम ने सोलहकारण व्रतोद्यापन के समय भट्टारक सोमसेन कृत रामपुराण ग्रंथ की प्रति इनके शिष्य शुभचंद्र को भेंट की थी।

संवत 1746 में चांदखेड़ी में विशाल प्रतिष्ठा का संचालन इन्हीं ने किया

इसी तरह एक अन्य अवसर पर संवत 1745 में श्रावकों ने मिलकर इनके शिष्य नाथूराम को सकलभूषण के उपदेश की रत्न माला की प्रति भेंट की थी। इनका एक शिष्य नेमिचंद्र अच्छा विद्वान था। उसने संवत 1769 में हरिवंशपुराण की रचना समाप्त की थी। इनकी ग्रंथ की प्रशस्ति में भट्टारक जगत कीर्ति की प्रशंसा में कवि ने छंद लिखा। पूर्व भट्टारकों के समान इन्होंने भी कितनी ही प्रतिष्ठाओं में भाग लिया। संवत 1741 में नरवर में प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ। इसी वर्ष तक्षकगढ़ (टोडारायसिंह) में भी प्रतिष्ठा महोत्सव संपन्न हुआ। संवत 1746 में चांदखेड़ी में विशाल प्रतिष्ठा हुई। उसका संचालन इन्हीं ने किया। इस प्रतिष्ठा समारोह में हजारों मूर्तियों की प्रतिष्ठा हुई थी। आज भी वे राजस्थान के विभिन्न मंदिरों में उपलब्ध होती हैं। इस प्रकार संवत 1770 तक भट्टारक जगतकीर्ति ने जो साहित्य एवं संस्कृति की जो साधना की। वह चिरस्मरणीय रहेगी।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
2
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page