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विधान के आठवें दिन धर्म सभा में भक्तामर के 7वें और 8वें काव्यों की बताई महिमा : शास्त्रों का सुख आपकी स्तुति से प्राप्त होता है- मुनि पूज्य सागर


संविद नगर, कनाडिया रोड, आदिनाथ जिनालय में अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के धर्म प्रभावना रथ के चौथे पड़ाव में 12 दिवसीय वृहद महामंडल विधान के आठवें दिन का आयोजन हुआ। इस अवसर पर अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने भक्तामर के काव्य 7 और 8 पर प्रवचन देते हुए कहा कि आपकी स्तुति से अनेक जन्मों के पाप क्षणभर में नष्ट हो जाते हैं। उन्होंने सीता का उदाहरण देते हुए कहा कि पूर्व जन्म में मुनि और आर्यिका को देखकर सीता ने मन में विचार किया कि वे क्या बातें कर रहे हैं। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


इंदौर। संविद नगर, कनाडिया रोड, आदिनाथ जिनालय में अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के धर्म प्रभावना रथ के चौथे पड़ाव में 12 दिवसीय वृहद महामंडल विधान के आठवें दिन का आयोजन हुआ। मुख्य पुण्यार्जक श्री शांतिलाल सेठ, पंकज ज्योति सेठी, महावीर भारती सेठी, प्रतीक, सक्षम और तनिष्क परिवार ने भक्तामर काव्य की 29, 30, 31 और 32 श्लोकों की आराधना करते हुए 224 अर्घ्य समर्पित किए।

इस आयोजन में अब तक कुल 1792 अर्घ्य समर्पित किए जा चुके हैं। इस अवसर पर शान्तिधारा का लाभ निर्मल कासलीवाल छावनी परिवार को मिला, जबकि दीप प्रज्वलन, चित्रानावरण और मुनि श्री के पाद प्रक्षालन का लाभ मुख्य पुण्यार्जक परिवार को प्राप्त हुआ।

जन्मों के पाप होते हैं नष्ट

इस अवसर पर अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने भक्तामर के काव्य 7 और 8 पर प्रवचन देते हुए कहा कि आपकी स्तुति से अनेक जन्मों के पाप क्षणभर में नष्ट हो जाते हैं।

उन्होंने सीता का उदाहरण देते हुए कहा कि पूर्व जन्म में मुनि और आर्यिका को देखकर सीता ने मन में विचार किया कि वे क्या बातें कर रहे हैं।

कर्म के बंध के कारण सीता को राम ने जंगल से छुड़वाया, लेकिन उनकी स्तुति के फलस्वरूप उन्हें राज्य और ज्ञान की प्राप्ति हुई। मुनि श्री ने आगे कहा कि जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और पेड़ भी आपकी भक्ति करते हैं। ये तत्व क्रमशः मनुष्य, देव और प्रभु बन जाते हैं।

भगवान के मस्तक पर चढ़ाया गया जल पुण्य करता है, और जो अग्नि आरती और नैवेद्य के लिए उपयोग होती है, वह भी पुण्य देती है।

आपके प्रभाव से तिर्यंच भी देव बन जाता है और अज्ञानी जीव भी केवलज्ञान प्राप्त कर लेता है। जब पृथ्वी पर आपके गुणों की स्थापना होती है, तो वह भी पूजनीय बन जाती है।

आपकी स्तुति पढ़ने से करोड़ों भावों में किए गए पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं, जैसे अंजुली में पानी अधिक समय तक नहीं रुकता। एक क्षण में पाप कर्म दूर हो जाते हैं और केवलज्ञान की प्राप्ति होती है।

उन्होंने कहा कि बेटे, धन, पत्नी आदि के मिलने का सुख शाश्वत नहीं है; यह सुख कभी दुख का कारण बन सकता है।

शास्त्रों का सुख आपकी स्तुति से प्राप्त होता है, जो एक-एक कर्म का नाश कर देती है और व्यक्ति को कर्म से रहित करती है।

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