दशलक्षण पर्व में जैन धर्म के दस महत्वपूर्ण गुणों का ध्यान और पालन किया जाता है। इस पर्व को “पर्वाधिराज” यानी पर्वों का राजा भी कहा जाता है, क्योंकि यह जैन धर्म के मूल सिद्धांतों का सार प्रस्तुत करता है। यह पर्व आत्मानुशासन और आत्मनिरीक्षण का अवसर है। इस दौरान लोग अपने कर्मों का आकलन करते हैं और उन्हें सुधारने का संकल्प लेते हैं। दशलक्षण पर्व जैन धर्मावलंबियों के लिए आत्मशुद्धि का समय है। इस विशेष अवसर पर आप भी पढ़िए दशलक्षण व्रत कथा….
उत्तमक्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, जान। त्याग अकिश्चन, ब्रह्मचर्य युत, ये दशधर्म कहे भगवान ॥ आत्मा के ये स्वाभाविक गुण, इन्हें गहें जो भवि मतिमान। तिनपद वन्द्य कथा दशलक्षण, व्रतकी कहूँ सुनो मतिमान ॥
दूसरे धातकीखण्ड द्वीप के पूर्वविदेह क्षेत्र में विशाल नाम का एक नगर है। वहां नीति-निपुण और प्रजावत्सल, प्रियङ्गद राजा था उसकी रानी का नाम प्रियंकरी था। इनके मृगाङ्कलेखा नामक कन्या थी। राजा के मंत्री का नाम मतिशेखर था। उसकी धर्मपत्नी का नाम शशिप्रमा था। उनके कमलसेना नाम की कन्या थी। इसी नगर में गुणशेखर नामक एक सेठ था। उसकी सेठानी का नाम शीलप्रभा था। उन दोनों के मदनवेगा नाम की एक कन्या थी। इसी नगर में लक्षभट नाम का एक ब्राह्मण था। ब्राह्मणी का नाम चन्द्रभागा था। उनके रोहणी कन्या थी। मृगाङ्कलेखा, कमलसेना, मदनवेगा और रोहणी ये चारों कन्यायें अतिरूपवती, गुणवती तथा बुद्धिमती थीं और सदैव धर्माचरण में तत्पर रहती थीं। एक समय बसन्तऋतु में कन्यायें अपने-अपने माता-पिता से आज्ञा लेकर वन-क्रीड़ा के लिए निकलीं और भ्रमण करते-करते कुछ दूर निकल गईं। ये वन की शोभा को देखकर प्रमुदित हो रही थीं, उसी समय इनकी दृष्टि उसी वन में विराजमान एक दिगम्बर जैन मुनि पर पड़ी। तब वे मुनिराज को नमस्कार कर वहाँ बैठ गईं और धर्मोपदेश सुनने लगीं। मुनि तथा श्रावक धर्म का उपदेश सुनकर वे चारों कन्याएँ विनयपूर्वक मुनिराज से पूछने लगीं कि हे गुरो ! यह तो हमने सुना परन्तु अब कृपा करके हमको ऐसा मार्ग बतलाइये कि जिससे पराधीन स्त्रीपर्याय तथा जन्म-मरण आदि के दुःखों से छुटकारा मिले। तब श्री गुरु ने कहा- हे बालिकाओं सुनो।
यह जीव अनादिकाल से मोहविवश होकर विपरीत आचरण कर ज्ञानावरण आदि कर्म का बन्ध करता है जिससे पराधीन होकर संसार में नानाप्रकार के दुःख भोगता है। यथार्थ में सुख आत्मा से कोई भिन्न पदार्थ नहीं है और न वह कहीं बाहर से ही आता है; किन्तु अपने ही आत्मा का स्वभाव है। जब कर्म का उदय तीव्र होता है तब यह जीव यथार्थ सुख-शांतिस्वरूप अपने उत्तमक्षमादि गुणों को भूलकर इनसे विपरीत क्रोधादिभावों को प्राप्त होता है। इस प्रकार यह स्वपर हिंसा करता है। कदाचित यह अपने स्वरूप का विचार कर अपने आपको उत्तमक्षमादि गुणों से विभूषित करता है तो निस्संदेह इस भव और परभव के सुख भोगकर परमपद (मोक्ष) को प्राप्त कर सकता है। स्वीपर्याय से छूटना तो कठिन ही क्या है? इसलिए हे पुत्रियों ! तुम इस दशलक्षणधर्म को त्रियोग से पालन करो, निस्संदेह अभीष्टफल मिलेगा।
जिनेन्द्र भगवान ने “उत्तमक्षमामार्दवार्ज वसत्यशौचसंयमतपस्त्यागा- किञ्चन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः” अर्थात् उत्तमक्षमा, उत्तममार्दव, उत्तमआर्जव, उत्तमसत्य, उत्तमशौच, उत्तमसंयम, उत्तमतप, उत्तमत्याग, उत्तम आकिञ्चन्य और उत्तमब्रह्मचर्य इस प्रकार धर्म के दशलक्षण बतलाये हैं। वे वास्तव में आत्मा के निजभाव हैं, जो क्रोधादिक कषायों से ढक रहे हैं।
उत्तमक्षमा-क्रोधकषाय के उपशम, क्षयोपशम या क्षय से प्रगट होती है। उत्तममार्दव-मानकषाय के उपशम क्षयोपशम या क्षय से प्रगट होता है। उत्तमआर्जव- मायाकषाय के उपशमादि से होता है। उत्तमसत्य-मिथ्यावचन के त्याग से होता है। उत्तमशौच लोभकषाय के उपशम, क्षय, क्षयोपशम से होता है।
उत्तमसंयम विषयानुराग के कम या नष्ट होने से होता है। उत्तम तप- इच्छाओं को वश में करने से होता है। उत्तमत्याग ममत्वभाव को कम या नष्ट करने से होता है। उत्तम आकिञ्चन्य निष्पृहता से उत्पन्न होता है और उत्तमब्रह्मचर्य कामविकार तथा उसके कारणों को हटाने से उत्पन्न होता है। इस प्रकार ये दशधर्म अपने प्रतिघातक दोषों के क्षयादि होने से प्रकट होते हैं।
(1) क्षमावान प्राणी कदापि किसी जीव से वैर-विरोध नहीं करता और न किसी को बुरा-भला ही कहता है। दूसरों के द्वारा अपने ऊपर लगाये हुए लांछनों को सुनकर वा आये हुये उपद्रवों से भी खिन्न नहीं होता और उन दुःखदायक जीवों पर करुणाभाव करके क्षमा कर देता है तथा अपने द्वारा किये हुये अपराधों को भी क्षमा माँगता है। इस प्रकार यह क्षमावान् व्यक्ति सदा निर्वैर रहकर अपना जीवन सुख और शांति से भरपूर बनाता है।
(2) मार्दवधर्मधारी व्यक्ति के क्षमा तो होती ही है; किन्तु जाति, कुल ऐश्वर्य, विद्या, तप, रूप, अधिकार और धन मद के न होने से विनयभाव भी प्रगट होता है। वह प्राणी अपने से बड़ों में भक्ति व विनय रखता और छोटों में करुणा व नम्रता रखता है। यथायोग्य मिष्ट वचन बोलता है। किसी से कभी कठिन शब्द का प्रयोग ही नहीं करता। इसी से यह मिष्टभाषी और विनयी व्यक्ति सर्वप्रिय होता है और किसी से द्वेष न होने से सानन्द जीवन-यापन करता है।
(3) आर्जव धर्मधारी व्यक्ति क्षमा और मार्दव धर्मपूर्वक ही आर्जवधर्म धारण करता है। यह जो कुछ मन से विचारता है वही वचन से कहता है और उसकी क्रिया भी तदनुकूल ही होती है। इस प्रकार यह सरल परिणामी व्यक्ति निष्कपट होने के कारण निश्चिन्त तथा सुखी होता है।
(4) सत्यवान् व्यक्ति जो बात जैसी होती है अथवा उसे जैसी सुनता व समझता है वैसी ही कहता है अन्यथा नहीं कहता। कहे हुए वचनों को नहीं बदलता और न कभी किसी से हानिकारक व दुःखदायक वचन बोलता है। अपने वचन पर सदा दृढ़ रहता है। अन्यथा प्रलापी न होने से विश्वासपात्र होता है। वह संसार में सम्मान व सुख को प्राप्त होता है।
(5) शौचवान् व्यक्ति पूर्वोक्त चारों धर्मों को पालता हुआ अपने आत्मा को लोभ से बचाता है। न्यायपूर्वक उद्योग करने से अपने शुभोदय के अनुसार जो पदार्थ प्राप्त होते हैं उनमें ही संतोष रखता है। पर धन का हरण नहीं करता। यदि अशुभोदय से घाटा पड़ जाय अथवा किसी प्रकार द्रव्य चला जाय तो भी खिन्न नहीं होता और अपने अशुभकर्म का विपाक समझकर धैर्य धारण करता है। अपने घाटे की पूर्ति के लिए कभी किसी को हानि पहुँचाने की चेष्टा नहीं करता। तृष्णा के न होने से वह सदा संतुष्ट रहता है और कभी किसी से ठगाया नहीं जाता।
(6) संयमी व्यक्ति पूर्वोक्त पाँचों व्रतों को पालता हुआ इन्द्रियों को उनके विषयों की ओर से रोकता है। ऐसी स्थिति में इसे कोई भी पदार्थ इष्ट व अनिष्ट प्रतीत नहीं होते; क्योंकि ये विषयानुराग के ही कारण प्रतीत होते हैं। विषयानुराग के ही कारण अपने-अपने लिए प्रिय-पदार्थ इष्ट, अप्रिय पदार्थ अनिष्ट माने जाते हैं। इष्टानिष्ट की कल्पना न होने के कारण संयमी उनमें हेय उपादेय की कल्पना नहीं करता। तब समभाव होता है जिससे समतारस का आनन्द प्राप्त होता है।
(7) तपस्वी व्यक्ति इन्द्रियों को वश करता हुआ अपने मन को भी पूर्णतया स्ववश करता है और उसे विविध विषयों में झुकने से रोकता है। किसी प्रकार की इच्छा उत्पन्न नहीं होने देता। इच्छा के अभाव में उसके आकुलता भी मिट जाती है। वह अपने ऊपर आगत विविध उपसर्गों को धीरतापूर्वक सहन करने में उद्यमी व समर्थ होता है। संसार की सभी शक्तियों से वह अडिग होता है, इसलिये वह अपने एकाग्रचिन्तानिरोध धर्म व शुक्लध्यान से अनादि से संचित घोर कर्मों का अल्पसमय में ही अभाव करके सच्चे सुख का अनुभव करता है।
(8) पूर्वोक्त सातों व्रतों में परिपक्व होने के बाद वह अपने आत्मा से राग- देषादि भावों को दूर करने तथा स्वपर उपकार के निमित्त आहारादि दान देता है और अपने आपको तथा अपनी सम्पत्ति को सफल समझता है। अपने नाम व ख्याति की चाह नहीं करता। दान देकर कभी उसका स्मरण नहीं रखता और न कभी किसी से प्रकट ही करता है। वास्तव में दान देकर भूल जाना ही दानी का स्वभाव होता है। इसका चित्त धनादि में ममत्व कर आर्तरौद्ररूप कभी नहीं होता जिससे उसका आत्मा सद्गति को प्राप्त होता है।
(9) बाह्य और आभ्यन्तर समस्त प्रकार के परिग्रह से ममत्व छोड़ देने बाला व्यक्ति सदैव निर्भय रहता है। उसे किसी वस्तु की सँभाल व रक्षा की भी चिंता नहीं होती। वह अपने शरीर से भी विस्मृत रहता है वह आत्मा के सिवाय समस्त पदार्थों व विभावों को त्याज्य समझता है जिससे वह प्रतिसमय असंख्य व अनन्तगुणी कर्मों की निर्जरा करता है जिससे प्रसन्न व सुखी रहता है।
(10) ब्रह्मचारी व्यक्ति पूर्वोक्त नव व्रतों में परिपक्व होकर निरन्तर अपने
आत्मा में ही रमण करता है। यह बाह्य स्त्री आदि से भी विरक्त रहता है। उसकी दृष्टि में लोक के सभी प्राणी समान प्रतीत होते हैं। यह स्त्री-पुरुष आदि का भेदकर्म की उपाधि मानता है। यह सोचता है कि सप्तधातुमय यह शरीर रागी जीव को सुहावना लगता है। यदि चामकी चादर हटा दी जाये अथवा वृद्ध अवस्था आ जाय तो फिर इसकी ओर देखने को जी नहीं चाहे। ऐसे घृणित शरीर में क्रीड़ा करना विष्टा के भीतर रहकर भी प्रसन्न रहने वाले कीट के समान है। यह सुभट काम के दुर्जय किले को तोड़कर अपने अनन्तसुखमय आत्मा में ही विहार करता है। ऐसे महापुरुष का सर्वत्र आदर होता है और वह सब कुछ करने को समर्थ होता है। इस व्रत की विधि इस प्रकार है-भाद्रपद, माघ और चैत्र मास के शुक्लपक्ष में पञ्चमी से चतुर्दशी तक दश दिन पर्यन्त यह व्रत किया जाता है। दशों दिन त्रिकाल सामायिक, प्रतिक्रमण, वन्दना, अभिषेक, पूजन, स्तवन, स्वाध्याय तथा धर्मचर्चा आदि कार्यों में पर्व का पूरा समय व्यतीत करना चाहिये।
रात्रि के समय जागरण व भजन करना चाहिये। सर्वप्रकार के रागद्वेष, क्रोधादिकषाय, इन्द्रियविषयपोषक व्यापार, विकथाओं वा आरम्भ का त्याग करना चाहिये। दशों दिन यथाशक्ति उपवास, वेला, तेला आदि करना चाहिए। यदि इतनी शक्ति नहीं होवे तो एकाशन, ऊनोदर तथा रसपरित्याग करना चाहिये। कामोत्तेजक, सचिक्कण, मिष्ट, गरिष्ट और स्वादिष्ट भोजन का त्याग करना चाहिये। स्वच्छ वा पवित्र वस्त्रों का ही उपयोग करना चाहिये।
ॐ ह्रीं अर्हन्मुखकमलसमुद्गताय उत्तमक्षमाधर्माङ्गाय नमः।
ॐ ह्रीं अर्हन्मुखकमलसमुद्गताय उत्तममार्दवधर्माङ्गाय नमः।
ॐ ह्रीं अर्हन्मुखकमलसमुद्गताय उत्तमार्जवधर्माङ्गाय नमः।
ॐ ह्रीं अर्हन्मुखकमलसमुद्गताय उत्तमसत्यधर्माङ्गाय नमः।
ॐ ह्रीं अर्हन्मुखकमलसमुद्गताय उत्तमशौचधर्माङ्गाय नमः।
ॐ ह्रीं अर्हन्मुखकमलसमुद्गताय उत्तमसंयमधर्माङ्गाय नमः। ॐ ह्रीं अर्हन्मुखकमलसमुद्गताय उत्तमतपोधर्माङ्गाय नमः।
ॐ ह्रीं अर्हन्मुखकमलसमुद्गताय उत्तमत्यागधर्माङ्गाय नमः।
ॐ ह्रीं अर्हन्मुखकमलसमुद्गताय उत्तमाकिञ्चन्यधर्माङ्गाय नमः।
ॐ ह्रीं अर्हन्मुखकमलसमुद्गताय उत्तमब्रह्मचर्यधर्माङ्गाय नमः।
इस प्रकार यह व्रत दश वर्ष पालन कर उत्साहपूर्वक यथाशक्ति उद्यापन करना चाहिए। दशलक्षण विधान करना चाहिये। धार्मिक आयतनों को चार प्रकारका दान देना चाहिये। दश जापें व दश ग्रन्थ मन्दिरों को देना चाहिये। यदि उद्यापन की शक्ति नहीं हो तो यह व्रत बीस वर्ष करना चाहिये। यह उपदेश व व्रत की विधि सुनकर पूर्वोक्त चार कन्याओं ने मुनिराज की साक्षीपूर्वक यह व्रत ग्रहण किया। दश वर्ष तक व्रतपालन कर उद्यापन किया। उत्तमक्षमादि धर्मों के अभ्यास से उन चारों कन्याओं का जीवन सुख और शांतिमय हो गया। उनकी मान्यता बढ़ गई और वे जगत में अतिविश्वसनीय बन गई। आयु के अंत में समाधि द्वारा शरीर छोड़कर महाशुक्र नामक दशवें स्वर्ग में अमरगिरि, अमरचूल, देवप्रभ और पद्मसारथि नामक महर्धिक देव हुये। वहां पर विविध प्रकार के स्वर्गीय सुख भोगकर अकृत्रिम चैत्यालयों की अनेक बार वंदनाकर पुण्योपार्जन कर आयु पूर्ण होने पर वहां से चयकर जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में मालवाप्रांत के उज्जैन नगर में मूलभद्र राजा के घर लक्ष्मीवती रानी के गर्भ से पूर्णकुमार, देवकुमार, मूलकुमार और पद्मकुमार नाम के गुणवान पुत्र हुये।













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