जैन धर्म में लड़का और लड़की में कोई भेद नहीं है। संसार की सृष्टि में स्त्री और पुरुष दो अंग हैं, जैसे-कुम्भकार के बिना चाक से बर्तन नहीं बन सकते अथवा कृषक के बिना पृथ्वी से धान्य की फसल नहीं हो सकती उसी प्रकार स्त्री पुरुष दोनों के संयोग के बिना सृष्टि की परंपरा नहीं चल सकती। पढ़िए यह विशेष आलेख…
जैन धर्म में लड़का और लड़की में कोई भेद नहीं है। संसार की सृष्टि में स्त्री और पुरुष दो अंग हैं, जैसे-कुम्भकार के बिना चाक से बर्तन नहीं बन सकते अथवा कृषक के बिना पृथ्वी से धान्य की फसल नहीं हो सकती उसी प्रकार स्त्री पुरुष दोनों के संयोग के बिना सृष्टि की परंपरा नहीं चल सकती। आज जब घर में कन्या का जन्म होता है तब घर वाले ही क्या अड़ोस-पड़ोस के लोग भी यही सोचने लगते हैं कि यह क्या बला आ गई ? उसका मूल कारण है दहेज, इस दहेज प्रथा ने कितने अनर्थों को जन्म दिया है, सब प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो रहा है।
एक समय था जब कन्या को सबसे श्रेष्ठरत्न और उनके माता-पिता को सबसे श्रेष्ठ रत्नाकर माना जाता था। वास्तव में जहां एक कन्या के स्वयंवर के समय करोड़ों राजा महाराजा आकर उपस्थित होते थे और सबके मन में यही आशा रहती थी कि यह कन्या मेरे गले में वरमाला डाले। इस विषय में सुलोचना, सीता, द्रौपदी आदि के प्रत्यक्ष उदाहरण आबाल-गोपाल प्रसिद्ध ही हैं लेकिन आज सर्वथा उसके विपरीत स्थिति देखने को मिलती है। कन्याओं के जन्म को हीन दृष्टि से देखने का मूल कारण जो दहेज है, उसका कैसे निर्मूलन किया जाए ? इस पर महिलाओं को सक्रिय कदम उठाना चाहिए। महिलाएँ ही महापुरुषों की जननी हैं, तीर्थंकर जैसे नर रत्नों को भी जन्म देने का सौभाग्य महिलाओं ने ही प्राप्त किया है। यही कारण है कि महामुनियों ने भी उनकी प्रशंसा में बहुत कुछ कहा है।













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