दिगम्बर जैन समाज सामाजिक संसद के पूर्व अध्यक्ष, तीर्थ क्षेत्र गोमटगिरी के आधार स्तम्भ व देश भर की अनेकों संस्थाओं का कुशल नेतृत्व कर जन हित व समाज हित मे उल्लेखनीय कार्य करने वाले पद्मश्री बाबूलाल पाटोदी जी की 12 वीं पुण्यतिथि पर विशेष आलेख प्रस्तुत है। इसे लिखा है बाबूलाल पाटोदी के पौत्र नकुल रतन पाटोदी और सौरभ पाटोदी ने। नकुल अपने दादा जी को ‘बा’ कहकर पुकारते थे, जो बाद में उनका नाम ही पड़ गया। पढ़िए गर्वित पौत्रों की अपने ‘बा’ के लिए शब्दांजली ।
मैंने अपने जीवन के 40 साल बा के साये में जिए,उम्र के हर पढ़ाव पर बा की कर्मठता, कर्मवीरता,काम के प्रति जीवटता बढ़ती ही गई , वे कहते थे यदि समाज सेवा करनी हो तो मोटी चमड़ी रखो। सुबह से रात तक सिर्फ़ और सिर्फ़ समाज सेवा पर चिंतन, चिंता और चर्चा। हमारी एक नही सुनते, जो ज़िद करते पूरी करते,चार बजे तो क्लाथ मार्केट जाने के लिए तैयार हो जाते , यदि ड्राइवर नही आया तो हमारी ऐसी की तैसी, जहां भी होता पहूंचता और बा को मार्केट छोड़ता,यह क्रम उम्र के अंतिम पडाव तक चला।
बा ने परमार्थ के साथ साथ ज़िंदगी को भी खूब जिया। वे अच्छे खाने के शौक़ीन थे , घूमने के शौक़ीन थे और कपड़े पर एक दाग और सल तो आ जाए और उनकी सफेद टोपी कड़कझम ना हो तो कोहराम। बा परिवार को भी एकजुट बनाए रखने की सजगता रखते थे। पाटोदी परिवार के वटवृक्ष के शीर्ष प्रेरणा दायक पुंज थे। जन्म स्थली ग्राम सुमठा व पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिरसुमठा के प्रति अगाध श्रद्धा उनके मन में थी,वे चाहते थे मेरे सौ वर्ष पूर्ण होने बाद भी मंदिर जी अनवरत चलता रहे, परिवार जन उनकी प्रेरणा का अक्षरशः पालन करते हैं।
मुझे गर्व है कि मैं बा का पोता हूँ , मेरा पहला बोला गया शब्द बा, उनका निक नेम बन गया, देश के राष्ट्रपति रहे, बा के मित्र शंकर दयाल शर्मा भी उन्हें बा कहकर ही बुलाते थे ,मुख्यमंत्री रहे अर्जुन सिंह जी, मोतीलाल जी वोरा, दिग्विजय सिंह जी ,शिवराज जी सभी सम्मान से बा कहते थे। बा ने परम पुज्य मुनि श्री विद्यानंद जी महाराज के आदेश या कहे सुझाव पर राजनीति छोडकर समाज सेवा को अंगीकार किया। महाराज जी भी बा से ही संबोधित करते थे।
पद्मश्री बा ने महात्मा गांधी की ट्रस्टीशिप विचारों से प्रेरित होकर सन् १९१४ में देश का सबसे बडा वैष्णव सहायक ट्रस्ट की स्थापना की जो आज शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक क्षेत्रों में कार्य कर रहा है। जो देश का सबसे बड़ा ट्रस्ट बन गया। बा ने अपने जीवन काल में 200 से अधिक सार्वजनिक ट्रस्टों की स्थापना कर नए दिशा बोध के प्रणेता स्त्रोत बनकर इंदौर का नाम देश भर मे रोशन किया , वे सच्चे अर्थों मे नए इंदोर के निर्माता थे। वे वैष्णव सहायक ट्रस्ट,अभिनव कला समाज,क्लाथ मार्केट अस्पताल,स्कूल,क्लाथ मार्केट बैंक,जालट्रस्ट,क्लाथ मार्केट ब्रोकर एसोसिएशन के स्थापक थे। बावनगजा व श्रवण बेलगोला के विकास के सूत्रधार थे।
उनके सामाजिक कार्यों से प्रेरित होकर 11 जनवरी 1981 को बा की षष्टी पूर्ति के अवसर पर माननीय मुख्यमंत्री अर्जुनसिंहजी ने इंदौर से 9 किलोमीटर दूर एक टेकरी भेंट की, जिस पर बा ने ट्रस्टी शिप के माध्यम से अपने दिव्य स्वप्न सांस्कृतिक धरोहर गोम्मटगिरी तीर्थ की स्थापना की। गौम्मटगिरी आज इंदौर की गौरव स्थली है और जैन समाज का देशभर का अग्रणी अतिशय क्षेत्र। धार्मिक, सामाजिक, स्वास्थ्य व शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वालों के लिए अमिट दिशा दर्शन कर गए। बा जीवन भर दिगंबर जैन समाज के सर्व मान्य नेता थे।
वैष्णव जन को तेने कहिये , जे पीर पराई जाणेरे।
पर दुख्खे उपकारे करे तोहे मन अभिमान न आणे रे।।
बापू के प्रिय भजन को मन में धारते हुए विधायक रहे बा के मन में राजनीति से हट कर पर पीड़ा मिटाने की चिंगारी जली। बा ने अपने जीवन के नौ दशक मे से सात दशक याने सत्तर वर्ष समाज सेवा को दिए,उसी से राष्ट्रीय सम्मान पद्मश्री मिला। पुन: अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता हूं की पता नही क्या पूर्व जन्म में पुण्य कार्य किया होगा हमने की बा के पौत्र के रूप में जन्म लिया।













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