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कुटीर उद्योग से ही देश में निकलेगी विकास की राह, अब जरूरत स्मार्ट विलेज की : कुण्डलपुर को मिल रही नई पहचान 


दमोह जिले का कुण्डलपुर एक छोटा-सा गांव जरुर है परन्तु यहां भी अब चंदेरी, महेश्वर और बनारस की तर्ज पर घर-घर हथकरघा चलाए जाने लगे हैं। यह सब कुछ संभव हो पाया जैन संत आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की दृष्टि से ओर आशीर्वाद से। पढ़िए राजेश रागी व रत्नेश जैन बकस्वाहा की रिपोर्ट…


कुण्डलपुर (दमोह)। दमोह जिले का कुण्डलपुर एक छोटा-सा गांव जरुर है परन्तु यहां भी अब चंदेरी, महेश्वर और बनारस की तर्ज पर घर-घर हथकरघा चलाए जाने लगे हैं। यह सब कुछ संभव हो पाया जैन संत आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की दृष्टि से ओर आशीर्वाद से। दरअसल कुंडलपुर जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान के अत्यंत प्राचीन मंदिर के लिए विश्वविख्यात है यहां पर भारत के कोने-कोने से यात्री आते हैं।

कुण्डलपुर कमेटी के प्रचार मंत्री जयकुमार जलज ने बताया कि आचार्य श्री के आशीर्वाद से प्रारंभ हुई संस्था श्रमदान में ग्रामीण युवा प्रशिक्षण लेते हैं और थोड़े से अभ्यास के बाद ही ये युवा चार पांच सौ रुपए प्रतिदिन का काम करने में सक्षम हो जाते हैं। इनमें से कई युवाओं ने गृहिणियों को भी हथकरघा सिखा दिया है। परिणाम यह हुआ कि उनके घर दूसरा निशुल्क हथकरघा भी आ गया। ऐसे कई पति-पत्नियां हैं जो मिलकर 30-40 हजार रुपए हर माह कमा रहे हैं। वास्तव में ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए इससे अच्छा मॉडल और नहीं हो सकता। लोगों को अपने गांव में ही रोजगार भी मिल गया। प्रकृति को हानि भी नहीं पहुंची और हमारी बहुमूल्य प्राचीन कला का संरक्षण भी हो गया; इसे कहते हैं “एक पंथ बहु काज”।

आचार्य श्री के सानिध्य में दिया गया था 100वां हथकरघा 

पिछले महीने छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में विराजमान जैन संत आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के सानिध्य में कुंडलपुर से लगे मढ़िया टिकैत गांव के नवयुवक महेश बर्मन, मोहराई गांव के रामरतन ढीमर, अशोक नगर से लगे कचनार गांव के कपिल सेन एवं गौरव सेन को हथकरघा दिया गया। आचार्य श्री ने इन नवयुवकों को समझाते हुए कहा कि अपने आसपास और जो फालतू युवा घूम रहे हैं। उनको भी हथकरघा सिखाओ अपने घर की महिलाओं को भी हथकरघा सिखाओ किंतु ध्यान रखना कि कमाया हुआ धन व्यसनों में न चला जाए उसका सदुपयोग करना। गुरु मुख से यह शिक्षा सुन यह सभी लोग धन्य हो गए। कला बहत्तर पुरुष की, ता मैं दो सरदार, एक जीव की जीविका, एक जीव उद्धार। ये वचन हैं एक जैन संत के और इनका अर्थ भी आसान है कि कहने को तो इंसान के सीखने के लिए बहुत सारी कलाएं हैं पर उनमें दो ही प्रमुख हैं एक जिससे वह रोज़ी-रोटी कमा सके और दूसरी जिससे वह संसार से मुक्त हो सके। वास्तव में देखा जाए तो आज दुनियाभर की सरकारों के समक्ष यह चुनौती है कि हर हाथ को काम कैसे मिले और इसके लिए वह हजारों करोड रुपए खर्च कर भी सभी लोगों को आजीविका के योग्य कौशल नहीं सिखा पा रहे हैं।

कपड़ा बनाने की कला सिखाई 

इस गंभीर समस्या का आसान सा समाधान एक जैन संत आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के द्वारा दिया गया। उन्होंने कुछ उच्च शिक्षित युवाओं को प्रेरणा दी कि ग्रामीण इलाकों में बसी युवा पीढ़ी को हाथ से कपड़ा बनाने की कला सिखाई जाए। इससे उन्हें अपने घर में ही खेती के साथ एक रोजगार मिल जाएगा। रोजगार को सुनिश्चित करने के लिए श्रमदान नामक एक संस्था की स्थापना की गई। इस संस्था में ग्रामीण युवक प्रशिक्षण लेने के लिए आते हैं और कुछ ही महीनों में वे वस्त्र निर्माण की विविध कलाओं में निपुण हो जाते हैं और उन्हें घर पर कपड़ा बुनाई करने के लिए एक हथकरघा दे दिया जाता है, वो भी नि:शुल्क। एक बार आकर अवश्य इस पावन कार्य को देखें। क्योंकि 150 करोड़ की आबादी वाले और 6 लाख गांवों वाले हमारे इस भारत की सारी समस्याओं का हल आखिरकार कुटीर उद्योग से ही निकल कर आएगा जिससे किसी ग्रामवासी को रोजी रोटी के लिए शहरों में संघर्ष नहीं करना पड़ेगा और हमारा देश पुनः सोने की चिड़िया बन जाएगा स्मार्ट सिटी तो हमने बना लीं अब बारी है स्मार्ट विलेज की।

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Shreephal Jain News

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