दिगम्बराचार्य पूज्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्म सभा में सम्बोधन करते हुए कहा कि अहिंसा-धर्म ही सर्व-श्रेष्ठ है, जीव रक्षा से बढ़कर अन्य कोई धर्म नहीं है। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…
बड़ौत। दिगम्बराचार्य पूज्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्म सभा में सम्बोधन करते हुए कहा कि अहिंसा-धर्म ही सर्व-श्रेष्ठ है, जीव रक्षा से बढ़कर अन्य कोई धर्म नहीं। एक जीव की प्राणों की रक्षा करने वाला मनुष्य करोड़ों यज्ञों से अधिक पुण्य प्राप्त करता है। दया, करुणा, अनुकम्पा से अहिंसा प्रारम्भ होती है। सम्पूर्ण व्रतों में ‘अहिंसा’ सर्वश्रेष्ठ है। जियो और जीने दो। जीवन जीना तुम्हारा अधिकार है, तो दूसरे जीवों को जीने देना तुम्हारा कर्तव्य है।
हिंसा ही अधर्म है, हिंसा पाप है, हिंसा अन्याय है, हिंसा अनैतिकता है, हिंसा आतंकवाद है, हिंसा उन्माद है, हिंसा पागलपन है। हिंसा से अपनी रक्षा करो। हिंसा अखण्डता को खण्ड-खण्ड कर देती है। उन्होंने कहा कि जो निज को समझ लेता है, वही परम-सुख को प्राप्त होता है। परम-शांति प्राप्त करना है, तो पर-से दूरियां बना लो। जितने अधिक संबंध होंगे, उतना ही अधिक कष्ट होगा। पुण्य क्षीण सुख से जीवन नहीं जीया सकता है।
प्रभु भक्ति, गुरु सेवा, संयमी परिणाम, शांत भाव से पाप का क्षय होता है, पुण्य की प्राप्ति होती है। पुण्य से ही संसार के सर्व- – सुख प्राप्त होते हैं। पुण्य हीन व्यक्ति दुर्गति को प्राप्त होता है। धैर्य सिद्धि में सहायक है। क्षण भर का धैर्य अनर्थ से बचा लेता है और पल भर की अधीरता / उतावलापन संकट में डाल देता है। धैर्य धारण करो। धैर्य से सर्व-कार्य सिद्ध हो जाते हैं













Add Comment