राष्ट्रीय उच्च माध्यमिक विद्यालय दरोली में गणिनी आर्यिका श्री सुभूषण मति माताजी ने आहार चर्या से पूर्व विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को संस्कार, विनय, व्यसनमुक्ति, राष्ट्रभक्ति और मानवीय मूल्यों का प्रेरक संदेश दिया। पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया डडूका की यह रिपोर्ट।
दरोली (बांसवाड़ा, राजस्थान)। चारित्र चक्रवर्ती प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की श्रमण परंपरा की गौरव, आगमिक प्रखर वक्ता एवं चर्या शिरोमणि गणिनी आर्यिका रत्न श्री सुभूषण मति माताजी (ससंघ) की आहार चर्या बुधवार, 15 जुलाई 2026 को राष्ट्रीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, दरोली में श्रद्धापूर्वक संपन्न हुई। आहार चर्या से पूर्व माताजी ने विद्यालय परिवार एवं विद्यार्थियों को जीवनोपयोगी संस्कारों से ओतप्रोत प्रेरक उद्बोधन दिया।
अच्छा इंसान बनना ही सबसे बड़ी शिक्षा
माताजी ने कहा कि सरस्वती की आराधना के बाद ही परमात्मा की आराधना का मार्ग प्रशस्त होता है। विद्यार्थी डॉक्टर, इंजीनियर और अधिकारी बनने का लक्ष्य रखते हैं, लेकिन सबसे पहले उन्हें एक अच्छा और संस्कारी इंसान बनने का संकल्प लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल मनुष्य का शरीर धारण कर लेना पर्याप्त नहीं, बल्कि इंसानियत ही सच्चे मनुष्य की पहचान है।
शिक्षा के साथ संस्कार भी आवश्यक
उन्होंने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षक एक शिल्पी की तरह होते हैं, जो कोरी स्लेट समान विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कारों का आधार भी है। आज शिक्षा का स्तर तो बढ़ा है, लेकिन संस्कारों की कमी के कारण समाज में शांति घटती जा रही है।
व्यसन और मोबाइल से सावधान रहने की प्रेरणा
गणिनी माताजी ने कहा कि व्यसन और दिखावे की प्रवृत्ति ने युवा पीढ़ी को भ्रमित कर दिया है। उन्होंने कहा, “आप गुटखा नहीं खा रहे, बल्कि गुटखा आपको खा रहा है।” उन्होंने मोबाइल की अति-निर्भरता से बचने और संयमित जीवन अपनाने का संदेश देते हुए कहा कि व्यसनी व्यक्ति कभी भी मानवीय और धार्मिक मूल्यों को आत्मसात नहीं कर सकता।
विनय, राष्ट्रभक्ति और मानवीय मूल्यों पर बल
माताजी ने विद्यार्थियों को माता-पिता, गुरु और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य निभाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल करियर बनाना नहीं, बल्कि संस्कृति और चरित्र का निर्माण करना भी है। उन्होंने युवाओं से “राजनीति नहीं, देशभक्ति सीखो” का संदेश देते हुए शान से स्वयं को भारतीय कहने का आह्वान किया।
‘करियर नहीं, कल्चर’ का दिया संदेश
अने उद्बोधन के अंत में माताजी ने कहा कि यदि समाज को श्रेष्ठ बनाना है तो नई पीढ़ी को केवल करियर नहीं, बल्कि संस्कृति और संस्कारों की शिक्षा भी देनी होगी। उनके प्रेरणादायी विचारों से उपस्थित शिक्षक, विद्यार्थी एवं श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे और गुरु माँ के जयघोष के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।













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