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जयपुर में श्रावक-श्राविकाओं की श्रद्धा से भर आईं आंखें : अध्यात्म के शिखर पर विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित   


आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के प्रति दिगंबर जैन समाज की संस्थाओं, मंदिरों सामाजिक, धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने बुधवार को श्री चंद्रप्रभ जिनालय चंद्रपुरी, बड़ के बालाजी में श्रीफल भेंट कर भावभीनी कृतज्ञता ज्ञापित कर भविष्य में भी लंबे प्रवास की याचना की। जयपुर से पढ़िए, डॉ. राजेश पंचोलिया की यह खबर…


 जयपुर। राजस्थान की राजधानी जयपुर राजनीतिक दृष्टिकोण के साथ धार्मिक अध्यात्म की दृष्टि से भी राजधानी हैं। लगभग 300 से अधिक जिनालयों की गुलाबी नगरी जयपुर जिले में विगत 4 माह से धर्म की गंगा प्रवाहित करने वाले 76 वर्षीय 58 वर्षों से संयम साधना करने वाले 36 वर्षों से आचार्य, 36 मूलगुण धारी, 36 साधुओं के संघ नायक आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के प्रति दिगंबर जैन समाज की संस्थाओं, मंदिरों सामाजिक, धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने बुधवार को श्री चंद्रप्रभ जिनालय चंद्रपुरी, बड़ के बालाजी में श्रीफल भेंट कर भावभीनी कृतज्ञता ज्ञापित कर भविष्य में भी लंबे प्रवास की याचना की। गुरु भक्त सुरेश सवलावत ने बताया कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, 10 मुनिराज, 20 आर्यिकाएं, 1 ऐलक, 4 क्षुल्लक एवं 1 क्षुल्लिका सहित कुल 37 पिच्छी के मंचासीन होने के बाद अनेक वक्ताओं ने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के अनेक संस्मरण भावांजलि प्रस्तुत की।

जयपुर समाज ने साधुओं को अपनी श्रद्धा के बल पर संभाला-आचार्य श्री

इस मौके पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने कहा कि समाज जब अपने मन में सारी बातें सोच लेती है और गुरु जनों का समागम लेती है तो उनके सभी कार्यों में सफलता निश्चित रूप से मिलती है। गुलाबी नगरी के जैन मंदिरों को देखकर ऐसा लगता है हमारे पूर्वजों ने चौकड़ी मोदीखाना के मंदिरों में अपना तन मन धन लगाया और जैन संस्कृति को प्रकट किया है। गुलाबी नगरी की जैन समाज अपनी श्रद्धा भक्ति के बल पर बड़े-बड़े संघों को संभाल लेती है।

विवेकवान व क्रियावान को कहते हैं श्रावक-मुनि हितेन्द सागर जी 

श्रमण व श्रावक जब दोनों रहते हैं तो धर्म रहता है। इसलिए श्रमण व श्रावक धर्म के मूल है। सच्चा श्रमण वही होता है जो हर पल सजग रहता है। जागृत रहने के साथ-साथ सुप्त अवस्था में भी जो सजग रहता है वही सच्चा श्रमण कहलाता है। विवेकवान और क्रियावान जो होता है वही श्रावक कहलाता है। श्रावक सो जाए तो श्रमण की चार्य पालन नहीं हो सकती।

इन लोगों ने की कृतज्ञता ज्ञापित 

गुरु भक्त सुरेश सबलावत ने बताया कि जैन समाज के भामाशाह अशोक पाटनी, श्री दिगंबर जैन आचार्य संस्कृत महाविद्यालय के अध्यक्ष एनके सेठी, श्री दिगंबर जैन अतिशक्षय क्षेत्र श्री महावीर जी के अध्यक्ष सुधांशु कासलीवाल, प्रमुख रतन व्यवसायी विवेक काला, श्री महावीर दिगंबर जैन शिक्षा परिषद के अध्यक्ष उमरावमल संघी, राजस्थान जैन सभा के अध्यक्ष सुभाष पांड्या, तीर्थ क्षेत्र कमेटी राजस्थान के अध्यक्ष राजकुमार कोठारी, श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र क्षेत्र पदमपुर के मानद् मंत्री हेमंत सोगाणी, जस्टिस एनके जैन, प्रदीप चूड़ीवाल, निहाल पांड्या, कमल चांदवाड, प्रमुख समाजसेवी चंद्र प्रकाश पहाड़िया, राजस्थान जैन सभा के महामंत्री मनीष वैद, शैलेश सोगानी, आलोक जैन, महावीर भानगडिया, कमल काला, नवीन जैन बस्सी वाले सहित गुलाबी नगरी जयपुर के सैकड़ों श्रद्धालुओं के साथ राजस्थान युवा महासभा के अध्यक्ष प्रदीप जैन, विनोद कोटखावदा, प्रतिष्ठा आचार्य विमल कुमार बनेठा, पीके जैन, भारत भूषण जैन सहित अन्य मंदिरों का प्रतिनिधित्व कर रहे पदाधिकारी ने आचार्य श्री के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए और प्रवास देने की बात कही।

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