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विनय, जिनवाणी स्वाध्याय मोक्ष का द्वार: आचार्य श्री वर्धमान सागर जी बोले-परमेष्ठी के चरण के साथ आचरण भी अपनाएं 


चंद्रपुरी, बड़ के बालाजी की पाठशाला में मंगलवार को आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने उपाध्याय और साधु परमेष्ठी के मूलगुणों की व्याख्या की। इसमें जिनवाणी के 11 अंग और 14 पूर्व अंग कुल 25 गुणों की चर्चा की गई। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि धर्म जीवन में उतारें। जयपुर से पढ़िए, डॉ.राजेश पंचोलिया की यह खबर…


जयपुर। चंद्रपुरी, बड़ के बालाजी की पाठशाला में मंगलवार को आचार्य श्री वर्धमानसागर जी ने उपाध्याय और साधु परमेष्ठी के मूलगुणों की व्याख्या की। इसमें जिनवाणी के 11 अंग और 14 पूर्व अंग कुल 25 गुणों की चर्चा की गई। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि धर्म जीवन में उतारें। धर्म केवल सुनने की चीज़ नहीं, बल्कि व्यवहार में लाने के लिए है। उन्होंने कहा कि मन, वचन और शरीर पर संयम रखें। अच्छा सोचें, मधुर बोलें, अनावश्यक गतिविधियों से बचें। त्याग नियमों की छोटी शुरुआत भी महत्वपूर्ण है। एकदम सब नहीं हो पाए तो भी थोड़ा-थोड़ा अभ्यास शुरू करें। सुरेश सबलावत,भागचंद चुड़ीवाल ने बताया कि आचार्य श्री ने धर्मसभा में कहा कि शरीर स्वस्थ और सक्रिय रहे, इसलिए नियमित हल्का योग और आसन करें। उपवास, त्याग और नियम अभ्यास से आसान होते जाते हैं। प्रतिदिन कोई छोटा त्याग करें जैसे रात्रि भोजन त्याग, संयमित भोजन कुछ समय मौन रात्रि भोजन नहीं करना। यह धर्म और स्वास्थ्य दोनों के लिए अच्छा बताया गया। मुनिश्री ने बताया कि बच्चों को छोटी उम्र से ही संयम और अनुशासन सिखाना चाहिए। समता बनाए रखें छोटी-छोटी बातों पर क्रोध और झगड़ा न करें। अपने दोषों पर ध्यान दें और दूसरों की कमी देखने से पहले स्वयं को सुधारने का प्रयास करें। जिनालय में पूजा शांति और भाव से करें।

पूजा करते समय बातचीत कम करें। ध्यान भगवान में रखें और दिखावे से बचें। मंदिर में मोबाइल साइलेंट रखे और शांत रहें तथा मन को स्थिर रखें क्योंकि, मंदिर भक्ति, ध्यान और आत्मशांति का स्थान है। अच्छे लोगों और संतों का संग करें। जीवन और विचार दोनों बदल देता है। धर्म में पद नहीं, गुण महत्वपूर्ण हैं। ज्ञान, विनय और अच्छा आचरण ही वास्तविक पहचान है। स्वाध्याय करते रहें धर्मग्रंथ पढ़ना और समझना आत्मविकास का मार्ग है।

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