जयपुर में विराजित आचार्य वर्धमान सागर जी ने प्रवचन में बताया कि जीव का शरीर उसके कर्मों के अनुसार बनता है। विभिन्न मंदिरों के दर्शन और स्वाध्याय के बीच उन्होंने कर्म सिद्धांत को सरल उदाहरणों से समझाया। — पढ़िए राजेश पंचोलिया की यह रिपोर्ट
वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टाधीश 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज 35 पीछी साधु संघ सहित जयपुर के प्राचीन पाटौदी मंदिर, चौकड़ी मोदीखाना जिनालय में विराजित हैं। यहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचकर धर्म लाभ ले रहे हैं।
विभिन्न मंदिरों के किए दर्शन
2 अप्रैल को आचार्य श्री ने दिगंबर मंदिर श्री खिंदूकन, श्री संघजी मंदिर, कालाछाबड़ा मंदिर और श्री सिरमोरियाँ मंदिर सहित कई जिनालयों के दर्शन किए। साथ ही वैद्यराज सुशीलजी की कर्मभूमि ‘आरोग्य भारती’ का भी अवलोकन किया।
स्वाध्याय का चल रहा क्रम
प्रतिदिन दोपहर में संघ में ‘प्रवचनसार भाषाटीका’ का स्वाध्याय किया जा रहा है, जिसमें समाजजन बड़ी श्रद्धा के साथ शामिल हो रहे हैं।
कर्म सिद्धांत का सरल संदेश
प्रवचन में आचार्य श्री ने बताया कि भावों के परिणाम से कर्मों का बंध होता है और इन्हीं कर्मों की चमत्कारिक शक्ति से जीव का शरीर सुंदर या कुरूप बनता है। इसलिए कर्मों को ही शरीर का कर्ता कहा गया है।
उदाहरण से समझाया गूढ़ ज्ञान
राजेश पंचोलिया के अनुसार, आचार्य श्री ने इसे सरल उदाहरण से समझाते हुए कहा कि जैसे कुम्हार मिट्टी से घड़ा, जुलाहा धागे से कपड़ा और कारीगर मकान बनाता है—ये सब सहकारी निमित्त हैं। उसी प्रकार निमित्त और उपादान से शरीर का निर्माण होता है।













Add Comment