आज अधिकांश जनमानस यह नहीं जानता कि भगवान महावीर को “महावीर” क्यों कहा जाता है। सामान्यतः यह धारणा है कि उन्होंने युद्ध लड़े होंगे, असुरों और दुर्जनों का नाश किया होगा, जैसे रामभक्त हनुमान जी ने रावण की लंका का विध्वंस किया और भगवान राम की सहायता की, इसलिए उन्हें महावीर कहा गया। पढ़िए प्रशांत जैन का विशेष का आलेख…
आज अधिकांश जनमानस यह नहीं जानता कि भगवान महावीर को “महावीर” क्यों कहा जाता है। सामान्यतः यह धारणा है कि उन्होंने युद्ध लड़े होंगे, असुरों और दुर्जनों का नाश किया होगा, जैसे रामभक्त हनुमान जी ने रावण की लंका का विध्वंस किया और भगवान राम की सहायता की, इसलिए उन्हें महावीर कहा गया।
किन्तु भगवान महावीर का जीवन इससे पूर्णतः भिन्न था। उन्होंने न तो कोई युद्ध लड़ा और न ही जीवन में कभी शस्त्र उठाया। वास्तव में दूसरों पर विजय प्राप्त करना सरल है, परंतु सबसे कठिन कार्य स्वयं पर विजय प्राप्त करना है।
संयम: अपने ही विरुद्ध एक महान युद्ध
भगवान महावीर ने अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर, प्राणी मात्र के कल्याण की भावना के साथ संसार को अहिंसा का महान संदेश दिया।
उन्होंने अपने जीवन में क्षमा, संयम, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह सहित दस धर्मों को धारण किया। जैन शास्त्र प्रवचनसार में कहा गया है—
“चारित्र खल्लु धम्मो”
अर्थात् चरित्र ही धर्म है।
भगवान महावीर ने ऐसा उच्च चरित्र धारण किया कि उनके संपर्क में आने वाला व्यक्ति आत्मिक रूप से “स्वस्थ” हो जाता है।
‘स्वास्थ्य’ का वास्तविक अर्थ
‘स्वास्थ्य’ का अर्थ है—‘स्व’ में स्थित होना।
भारतीय दर्शन में मोक्ष को परम पुरुषार्थ माना गया है, और मोक्ष का अर्थ है अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित होना। जैन परंपरा में इसी को ‘स्वभाव’ कहा गया है।
चार कषाय: आत्मा के रोग
भगवान महावीर ने चार प्रमुख आंतरिक रोग बताए—
क्रोध
मान
माया
लोभ
इन चारों को ‘कषाय’ कहा गया है, क्योंकि ये आत्मा के शुद्ध स्वरूप को विकृत कर देते हैं। जो इन कषायों पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही “जिन” कहलाता है और उसके अनुयायी “जैन”।
अहिंसा और राग-द्वेष का संबंध
जैन धर्म अहिंसा के लिए प्रसिद्ध है, किन्तु भगवान महावीर ने स्पष्ट किया कि हिंसा का मूल कारण राग और द्वेष हैं।
जहाँ राग-द्वेष है, वहीं हिंसा है।
यदि राग-द्वेष समाप्त हो जाएं, तो दूसरों को पीड़ा देने का प्रश्न ही नहीं उठता।
अनेकांत: सत्य का बहुआयामी स्वरूप
भगवान महावीर की परंपरा में ‘अनेकांत’ का अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत मिलता है, जिसका अर्थ है—सत्य बहुआयामी होता है।
निष्पक्षता, अपरिग्रह और अहिंसा—ये तीनों एक ही सत्य के विभिन्न रूप हैं। भगवान महावीर ने अपनी गहन साधना और कठोर तपस्या से जिस सत्य का साक्षात्कार किया, उसमें सबका हित निहित है, किसी का अहित नहीं।
‘जीओ और जीने दो’ का संदेश
भगवान महावीर का सबसे महान संदेश है—
“जीओ और जीने दो”
इसी संदेश, आत्मसंयम, अहिंसा और आत्मविजय के कारण उन्हें “महावीर” कहा जाता है—वह महावीर, जिसने संसार नहीं, बल्कि स्वयं को जीता।













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