जब मन में उत्साह आता है तो शरीर में सकारात्मक रसायनों (हार्माेन) का स्राव होने लगता है और जब मन में भय आता है तो शरीर कांपने लगता है और जब क्रोध आता है तो रक्तचाप बढ़ जाता है। यह उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागरजी ने व्यक्त किए। विदिशा से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…
विदिशा। जब मन में उत्साह आता है तो शरीर में सकारात्मक रसायनों (हार्माेन) का स्राव होने लगता है और जब मन में भय आता है तो शरीर कांपने लगता है और जब क्रोध आता है तो रक्तचाप बढ़ जाता है। यह उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागरजी ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जब चिंता होती है तो नींद उड़ जाती है अर्थात भाव बदला तो रसायन बदले। रसायन बदले तो शरीर स्वस्थ और अस्वस्थ हो जाता है। भावनायोग एक विज्ञान है। जिसके माध्यम से हम अपनी भावनाओं को नियंत्रण करने में सफल होते है। मुनिश्री पंचकल्याणक महा महोत्सव के दूसरे दिन भगवान के गर्भ कल्याणक अवसर पर भावनायोग की प्रस्तावना प्रस्तुत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मन और भावना का गहरा संबंध है यदि मन में ईर्ष्या है तो शांति नहीं मिलेगी। यदि मन में कृतज्ञता के भाव है तो आनंद स्वतः आएगा। यदि मन में द्वेष है तो भीतर जलन रहेगी। यदि मन में मैत्री है तो भीतर मधुरता रहेगी।
जीवन जीने की एक कला भावनायोग
मुनिश्री प्रमाणसागरजी ने कहा कि चेतना और भावना का गहरा संबंध है। यदि भावना पवित्र है तो चेतना ऊपर उठती है यदि भावना अपवित्र है चेतना नीचे गिरती है।भावना ही हमें मनुष्य से महापुरुष बनाती है और भावना ही हमें पतन की ओर भी ले जाती है। भावनायोग के माध्यम से अपने अंदर की भावनाओं को शुद्ध, संतुलित एवं सकारात्मक दिशा प्रदान करना है। यह न तो केवल आसन है और न केवल ध्यान की कोई तकनीक। यह तो जीवन जीने की एक कला है। यदि हम क्रोध को करुणा में ईर्ष्या को प्रेरणा में लोभ को संतोष में बदलना सीख जाएं तो समझ लीजिए। हमने भावनायोग सीख लिया और जिस दिन भावनायोग हमारे जीवन में आ गया, उस दिन हमारे जीवन में आमूलचूल परिवर्तन निश्चित है।
तन स्वस्थ रहेगा तो मन मस्त रहेगा
मुनिश्री ने कहा कि तन स्वस्थ रहेगा तो मन मस्त रहेगा और चेतना भी प्रशस्त रहेगी। उन्होंने भावनायोग को विज्ञान से जोड़ते हुए कहा कि हमारे मस्तिष्क में भावनाओं को नियंत्रित करने वाला प्रमुख भाग लिम्बिक सिस्टम है। इसमें मुख्यतः तीन महत्वपूर्ण संरचनाएं कार्य करती हैं। जैसे एमिग्डाला भय, क्रोध, तनाव जैसी तीव्र भावनाओं को नियंत्रित करता है एवं खतरे की स्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देता है। दूसरा है प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, जो हमें निर्णय लेने, संयम रखने और नैतिकता की ओर ले जाता है तथा एमिग्डाला की तीव्र प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करता है। जब हम सकारात्मक और निर्मल भाव रखते हैं तो यह भाग अधिक सक्रिय होता है। तीसरा है हिप्पोकैम्पस जो हमारी स्मृति तथा सीखने की कला विकसित करता है तथा दीर्घकालिक तनाव से मुक्ति दिलाता है।
लगातार तनाव से शरीर में कॉर्टिसोल बढ़ता है
मुनि श्री ने कहा कि जब हम क्रोध, भय, ईर्ष्या में रहते हैं तो एमिग्डाला अधिक सक्रिय हो जाता है। जब हम करुणा, शांति, श्रद्धा और सकारात्मकता में रहते हैं तो प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स एमिग्डाला को संतुलित करता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि लगातार तनाव से शरीर में कॉर्टिसोल बढ़ता है, जिससे इम्युनिटी कमजोर होती है। वहीं सकारात्मक भाव, ध्यान, प्रार्थना और कृतज्ञता से तनाव के हार्माेन कम होते हैं। शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है तथा सूजन कम होती है। उन्होंने प्लेसीबो और नोसीबो इफेक्ट की चर्चा करते हुए कहा कि प्लेसीबो इफेक्ट में व्यक्ति को विश्वास दिलाया जाता है कि उसे प्रभावी दवा दी गई है और उसी केवल विश्वास के कारण उसका स्वास्थ्य सुधरने लगता है। भले ही वह दवा न होकर केवल जल हो।
…और बुखार उतर गया
मुनिश्री ने 1987 की एक घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि एक बहन, जो कि मलेरिया से पीडित थी और 104 डिग्री बुखार था। वह गुरुदेव के पास आई तो गुरुदेव ने उससे नहाने की बात कही और उसने नहा लिया और वह जब थोड़ी देर बाद गुरुदेव के पास आई और उसने कहा कि मेरा बुखार उतर गया। गुरुदेव बड़े आश्चर्य में, उन्होंने उससे ‘नहा’ एक पत्ती को लेने का कहा था और उसने उसे नहाने से समझ लिया। यह मन की शक्ति का प्रमाण है। सकारात्मक अपेक्षा शरीर में वास्तविक जैव रासायनिक परिवर्तन कर सकती है।
नकारात्मक सोच शरीर पर विपरीत प्रभाव डालती है
दूसरा है नोसीबो इफेक्ट जब किसी को नकारात्मक विश्वास दिला दिया जाए कि वह असाध्य रोग से ग्रसित है तो अच्छी दवा भी कम प्रभाव दिखाती है। इससे यह सिद्ध हो गया कि नकारात्मक सोच शरीर पर विपरीत प्रभाव डालती है। बहन को गुरुजी पर पूर्ण विश्वास था कि अब मैं ठीक हो जाऊंगी का भाव प्लेसीबो इफेक्ट हुआ और बुखार में कमी आई। मुनि श्री ने कहा कि यह अंधविश्वास नहीं बल्कि मन-मस्तिष्क का शरीर से गहरे संबंध का उदाहरण है। भाव शुद्ध होंगे तो मस्तिष्क संतुलित रहेगा। मस्तिष्क संतुलित रहेगा तो शरीर स्वस्थ रहेगा। विश्वास औषधि बन सकता है और भय रोग को और बढ़ा सकता है।
माता मरुदेवी की गोद भराई की
इस अवसर पर मुनि श्री प्रसाद सागरजी, मुनि श्री शीतलसागरजी, मुनि श्री संधानसागरजी सहित क्षुल्ल्क श्री समादर सागरजी मंचासीन रहे। मुनिसंध के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं मीडिया प्रभारी प्रसन्न जैन दीपू ने बताया कि प्रातःकाल मुनि श्री द्वारा भावनायोग कराया गया। जिसमें बहूत बड़ी संख्या में जैन एवं जैनेत्तर समुदाय ने भाग लिया एवं दोपहर में माता मरुदेवी की गोद भराई की रस्म पूर्ण हुई तथा संध्याकाल उपरांत मंगल आरती के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं नाभिराय का दरबार लगा। जिसमें माता के 16 स्वप्न एवं उसके फलादेश को बताया गया। अष्टदेवियां तथा 56 कुमारियों द्वारा माता की सेवा एवं नृत्य के दृश्य दिखाए गए। कुबेर द्वारा रत्नों की वर्षा तथा विभिन्न प्रदेशों के राजाओं द्वारा भेंट एवं गर्भ कल्याणक की क्रियाएं दिखाई गईं।
जन्म कल्याणक 27 फरवरी को
प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि 27 फरवरी को त्रिलोकीनाथ का जन्म कल्याणक मनाया जाएगा। इस अवसर पर ऐरावत हाथी पर सौधर्मइंद्र और शचि इंद्राणी बालक आदिकुमार को लेकर निकलेंगे एवं पांडुक शिला पर 1008 रत्नमयी कलशों से अभिषेक की क्रिया होगी एवं राजदरबार में बाल क्रीड़ा के दृश्य दिखाए जाएंगे।













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