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चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन : लक्ष्मी का नहीं सरस्वती का उपासक बनो – आचार्य श्री प्रमुख सागर महाराज


आचार्य श्री प्रमुख सागर महाराज ने कहा कि व्यक्ति धन से महान होता है या धन के त्याग से महान होता है। अर्थ जीवन को व्यर्थ भी कर सकता है और अर्थ जीवन को समर्थ भी बना सकता है। मात्र अर्थ को समझने की जरूरत है और यह अर्थ भी कई प्रकार का है। पढ़िए सुनील सेठी की रिपोर्ट…


गुवाहाटी। स्थानीय फैंसी बाजार स्थित भगवान महावीर धर्म स्थल में उपस्थित आचार्य श्री प्रमुख सागर महाराज ने श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि व्यक्ति धन से महान होता है या धन के त्याग से महान होता है। अर्थ जीवन को व्यर्थ भी कर सकता है और अर्थ जीवन को समर्थ भी बना सकता है। मात्र अर्थ को समझने की जरूरत है और यह अर्थ भी कई प्रकार का है।

जैसे धन के कारण मन बंटता हो तो पहले धन बांट देना लेकिन मन नहीं बंटने देना। संपदा के कारण सुख शांति बंटती हो तो पहले संपदा को बांट देना लेकिन सुख शांति को मत बंटने देना। उन्होंने कहा कि मनुष्य सोने के लिए सुंदर सा पलंग तो खरीद सकता है लेकिन नींद नहीं। पढ़ने के लिए अच्छी-अच्छी पुस्तकें तो खरीद सकता है लेकिन ज्ञान नहीं। इसीलिए पैसे को जीवन का महत्वपूर्ण अंग मत मानो क्योंकि पैसा तो हाथ का मैल है और लक्ष्मी तो हमेशा चंचल स्वरूप है।

आज तुम्हारे यहां खड़ी है तो कल दूसरी जगह भी जा सकती है और सरस्वती बैठी हुई है, उसके हाथ में जो वीणा है वो इस बात का प्रतीक है कि यदि हम उसके शरण में आए तो संगीत हमारे हृदय से अपने आप फूट पड़ेगा जो वीणा के हृदय से फूटता है। इसीलिए हमें लक्ष्मी का नहीं, सरस्वती का उपासक बनना चाहिए। इससे पूर्व आज प्रातः आचार्य श्री ससंघ के मुखारविंद से श्रीजी की शांतिधारा करने का परम सौभाग्य महेंद्र- कुमार शैलेंद्र कुमार बड़जात्या परिवार दिमापुर वाले को प्राप्त हुआ। मालूम हो कि चातुर्मासिक स्थल में संध्या कालीन आरती के पश्चात विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में गुरु भक्त उपस्थित होकर पुण्यार्जन कर रहे हैं। यह जानकारी समाज के प्रचार प्रसार विभाग के मुख्य संयोजक ओम प्रकाश सेठी एवं सह संयोजक सुनील कुमार सेठी ने दी।

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