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गुरु के प्रति होना चाहिए समर्पण का भाव : मुनिश्री सारस्वत सागर जी के प्रवचन में गुरु शिष्य संबंधों का बखान 


भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में नित्य मुनिराजों के प्रवचनों ने अलग-अलग विषयों पर धर्म देशना प्रदान की जा रही है। बुधवार को भी यहां मुनिश्री सारस्वतसागर जी के प्रवचन में गुरु शिष्य के आंतरिक संबंधों को बड़ी ही स्पष्टता से प्रस्तुत किया गया। नांद्रे से पढ़िए, यह खबर…


नांद्रे। भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में नित्य मुनिराजों के प्रवचनों ने अलग-अलग विषयों पर धर्म देशना प्रदान की जा रही है। बुधवार को भी यहां मुनिश्री सारस्वतसागर जी के प्रवचन में गुरु शिष्य के आंतरिक संबंधों को बड़ी ही स्पष्टता से प्रस्तुत किया गया। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील कोल्हापुर ने बताया कि पट्टाचार्य विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्री श्रुतसागर महाराज जी का नगर में चातुर्मास जारी है। भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान मुनिराजों के प्रवचन हो रहे हैं। मुनि श्री सारस्वत सागर महाराज जी ने प्रवचन में कहा कि एक बार शिष्य आश्रम के मंदिरांे में घूम रहा था तभी वहां एक हस्त रेखा विज्ञानी आया और वह शिष्य से पूछता है कि गुरुजी कहां हैं? तो शिष्य कह देता है कि गुरुजी अभी श्रुताभ्यास कर रहे हैं। आपको थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी। वह हस्तरेखा विज्ञानी ने शिष्य से बातचीत करते हुए प्रतीक्षा काल को पूरा करने का निर्णय किया तभी गुरु को गले-गले कफ आया और वे कफ विसर्जन के लिए खिड़की पर आए। तभी उन्होंने शिष्यों को हस्त रेखा विज्ञानी को हाथ दिखवाते हुए देखा। देखकर कफ का विसर्जन कर पुनः अपने श्रुताभ्यास में लीन हो गए। ज्योतिषी शिष्य से कहते हैं तू अपने गुरुजी से भी आगे निकलेगा। यह बात सुनकर शिष्य के ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। तभी गुरु का द्वार खुलता है और वह हस्त रेखा विज्ञानी गुरु के दर्शन करने को चला जाता है।

कभी गुरु आज्ञा का उल्लंघन न हो 

मुनिश्री ने बताया कि शिष्य अपने होश-हवाश खो बैठा और अपने गुरुजी की आज्ञा का उल्लंघन करने लगा। उनका अपमान करने लगा। ऐसा करते हुए एक माह हो गया। पुनः वो ज्योतिषी आया, शिष्य ने ज्योतिषी को अपना हाथ दिखाया ज्योतिषी हाथ देखकर चकित हो गया। अब आप गुरु भक्ति नहीं करते हो। अनुशासन में नहीं रहते हो। गुरु के प्रति समर्पित भाव नहीं है। अब इसका हाथ पूरा विपरीत बोल रहा है। शिष्य ज्योतिषी की सारी बात समझ गया और वह गुरुजी से क्षमा मांगने लगा। गुरुजी ने उसे क्षमा कर दिया और वह शिष्य पहले जैसा जीने लगा। आगे जाकर वह एक श्रेष्ठ गुरू के रूप में उभरा।

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