दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -162 सच्ची सफलता तभी मिलती है, जब वाणी और कर्म एक समान हों : ईश्वर को पाने के लिए बाहरी तामझाम की आवश्यकता नहीं है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 162वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


“जैसी मुख तै नीकसै, तैसी चाले चाल।

पारब्रह्मा नेड़ा रहे, पल में करे निहाल॥”


कबीर इस दोहे में उस व्यक्ति की महत्ता को उजागर करते हैं, जिसकी वाणी और आचरण एक समान हों —

जिसका जीवन भीतर और बाहर से एक-सा, सच्चा और निष्कलंक हो।

जिसकी बातें वैसी ही हों जैसी उसकी चाल —

अर्थात जो जो कहता है, वही करता भी है —

उसके भीतर पारब्रह्म की उपस्थिति स्वतः प्रकट हो जाती है।

ईश्वर ऐसे ही एकरस, सत्यनिष्ठ और पारदर्शी हृदय में बसते हैं।

दोहरे जीवन, छल और पाखंड से भरा हुआ व्यक्ति केवल मुख से भक्ति करता है,

लेकिन ईश्वर तो हृदय की गहराई में छिपे भावों को तौलते हैं।

उन्हें दिखावे, आडंबर या शब्दाडंबर से प्रसन्न नहीं किया जा सकता।

ईश्वर को पाने के लिए बाहरी तामझाम नहीं,

बल्कि मन, वाणी और कर्म में सच्चाई का समरस मेल चाहिए।

जब व्यक्ति की कथनी और करनी में एकता होती है,

तो उसका चरित्र विश्वसनीय बनता है, और

उसी में ईश्वर स्वयं प्रतिबिंबित होते हैं।

कबीर का यह संदेश आज के समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक है —

जहां शब्दों से बड़ी-बड़ी बातें तो होती हैं,

पर आचरण में उनका प्रतिबिंब कम दिखाई देता है।

सच्ची सफलता, शांति और ईश्वर की कृपा

तभी प्राप्त होती है जब वाणी और कर्म एक समान हों।

“जब इंसान की बात और बर्ताव एक जैसे हों —

तब ईश्वर की कृपा स्वतः उसके जीवन में बरसने लगती है।”

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