विश्व में हिंसा, युद्ध, असहिष्णुता, आतंकवाद और पर्यावरण संकट जैसी समस्याएँ भी तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे समय में मानवता को जिस नैतिक दिशा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन की आवश्यकता है, वह हमें लगभग 2600 वर्ष पहले भगवान महावीर के जीवन और उनके सिद्धांतों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। महावीर जयंती पर जयेन्द्र जैन’निप्पू चन्देरी का यह विशेष आलेख पढ़िए…
मानव सभ्यता आज अभूतपूर्व वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के दौर से गुजर रही है। अंतरिक्ष की खोज से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक मनुष्य ने अनेक अद्भुत उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, किंतु इसके साथ ही विश्व में हिंसा, युद्ध, असहिष्णुता, आतंकवाद और पर्यावरण संकट जैसी समस्याएँ भी तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे समय में मानवता को जिस नैतिक दिशा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन की आवश्यकता है, वह हमें लगभग 2600 वर्ष पहले भगवान महावीर के जीवन और उनके सिद्धांतों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसलिए आज यह कहना अत्यंत सार्थक है कि विश्व शांति और मानव कल्याण के लिए वर्तमान युग को पुनः वर्धमान की आवश्यकता है।
महावीर जयंती जैन धर्म का एक अत्यंत पावन और प्रेरणादायक पर्व है। इस दिन भगवान महावीर के जन्मोत्सव को पूरे विश्व में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि मानवता को उनके महान संदेशों का स्मरण कराने और उन्हें अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा देने का अवसर भी है। भगवान महावीर का जीवन तप, त्याग, आत्मसंयम और करुणा का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से यह सिद्ध किया कि आत्मा की शुद्धि और समाज की शांति का मार्ग अहिंसा, संयम और सत्य के माध्यम से ही संभव है।
भगवान महावीर के उपदेशों का मूल आधार अहिंसा है। उन्होंने कहा कि किसी भी जीव को मन, वचन और कर्म से कष्ट पहुँचाना हिंसा है। महावीर स्वामी के अनुसार प्रत्येक जीव में आत्मा समान रूप से विद्यमान है, इसलिए हर जीव के प्रति दया और करुणा का भाव रखना ही सच्चा धर्म है। आज जब विश्व के अनेक क्षेत्रों में युद्ध और संघर्ष की स्थिति बनी हुई है, तब महावीर का अहिंसा का सिद्धांत विश्व शांति के लिए सबसे प्रभावी और प्रासंगिक मार्ग बन सकता है। यदि मानव समाज इस सिद्धांत को अपनाए, तो हिंसा, घृणा और प्रतिशोध की भावना स्वतः समाप्त हो सकती है।
भगवान महावीर ने केवल अहिंसा का ही संदेश नहीं दिया, बल्कि उन्होंने अनेकांतवाद का भी महान सिद्धांत प्रतिपादित किया। अनेकांतवाद का अर्थ है कि सत्य के अनेक पहलू हो सकते हैं और प्रत्येक दृष्टिकोण में कुछ न कुछ सत्य अवश्य होता है। यह सिद्धांत हमें सहिष्णुता, संवाद और आपसी समझ की भावना विकसित करने की प्रेरणा देता है। आज की दुनिया में विचारों की कट्टरता और असहिष्णुता के कारण अनेक विवाद और संघर्ष उत्पन्न होते हैं। यदि समाज महावीर के अनेकांतवाद को स्वीकार कर ले, तो मतभेद संवाद और समझदारी के माध्यम से सुलझाए जा सकते हैं।
इसी प्रकार भगवान महावीर ने अपरिग्रह अर्थात अधिक संग्रह न करने का सिद्धांत भी दिया। आधुनिक युग में मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं और संसाधनों के अत्यधिक संग्रह की प्रवृत्ति में उलझता जा रहा है। इसका परिणाम पर्यावरण संकट, सामाजिक असमानता और मानसिक तनाव के रूप में सामने आ रहा है। यदि मनुष्य महावीर के अपरिग्रह सिद्धांत को अपनाए, तो जीवन में संतुलन और संतोष की भावना विकसित हो सकती है और प्रकृति के साथ सामंजस्य भी स्थापित हो सकता है।
जैन दर्शन का प्रसिद्ध सूत्र है — “परस्परोपग्रहो जीवानाम्”, अर्थात सभी जीव एक-दूसरे के उपकार के लिए हैं। यह सिद्धांत हमें यह समझाता है कि इस संसार में कोई भी जीव पूर्णतः स्वतंत्र नहीं है। सभी जीव और प्रकृति के तत्व एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। आज जब पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता की रक्षा की आवश्यकता पूरी दुनिया में महसूस की जा रही है, तब महावीर का यह संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
महावीर जयंती का पर्व हमें भगवान महावीर के इन महान सिद्धांतों को स्मरण करने और उन्हें अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता है। यह दिन केवल पूजा-अर्चना का अवसर नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मसुधार का भी अवसर है। यदि मानव समाज महावीर के अहिंसा, अनेकांतवाद और अपरिग्रह के सिद्धांतों को अपने जीवन में उतार ले, तो विश्व में शांति, सद्भाव और संतुलन की स्थापना संभव है।
अंततः कहा जा सकता है कि भगवान महावीर के सिद्धांत केवल जैन धर्म तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सम्पूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक हैं। उनका जीवन और दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पहले था। इसलिए यह कहना बिल्कुल उचित है कि विश्व शांति और मानव कल्याण के लिए आज के युग को फिर से वर्धमान की आवश्यकता है।













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