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दुनिया में सबसे मुख्य प्रदूषण भाव प्रदूषण है: वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी जी ने मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान और कर्म सिद्धान्त के बारे में बताया


वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भीलूड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि हमारे प्राचीन आचार्यो ने मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान, कर्म सिद्धांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मुनि यह चित्त रूपी हाथी इतना प्रबल है कि उसका पराक्रम अनिवार्य है नहीं तो वह संयम रूपी घर को नष्ट कर देगा। भीलूड़ा से पढ़िए, अजित कोठिया की यह खबर…


भीलूड़ा। वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भीलूड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि हमारे प्राचीन आचार्यो ने मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान, कर्म सिद्धांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मुनि यह चित्त रूपी हाथी इतना प्रबल है कि उसका पराक्रम अनिवार्य है नहीं तो वह संयम रूपी घर को नष्ट कर देगा। चित्त को हाथी की उपमा दी है। हाथी सामान्यतः बुद्धिमान शाकाहारी भद्र सामाजिक प्राणी है तथापि काम वेदना से वह उत्तेजित होकर क्रूर बन जाता है. अन्य क्रूर प्राणियों से भी साठ गुना अधिक क्रूर हो जाता है। हाथी के संभोग के समय हारमोंस स्राव होता है. जिससे मदमस्त हो जाता है उसके मद झरता है।

जिसका भाव उदार नहीं, शुभ नहीं वह समस्त पाप करता है। युद्ध, लड़ाई झगड़ा सब पहले भाव से होते हैं वास्तव में वह बाद में होते हैं। धर्म के नाम पर भी क्रुरता असंयम आदि से अधर्म हो रहा है। यह चंचल चित्त रूपी बंदर दौड़ता रहता है.। गलत चिंतन करता है दूसरों की निंदा चुगली करके पाप बंध करता है। मन की चंचलता से अधिक पाप बंध होता है। आचार्य श्री यहां पर डांट लगाते हुए कहते हैं जो मन को कंट्रोल नहीं करता वह मूर्ख है। वह धर्म की चर्चा करता हुआ लज्जित करता है। वह चित्त को तो जीत नहीं सका तथा ध्यान की चर्चा करता है धर्म की चर्चा करता है, पुण्य,त्याग तपस्या की चर्चा करता है तो वह मूर्ख, निर्लज्ज, ढीठ, पापी है। बाह्य त्याग अंतरंग त्याग के लिए है। सबसे मुख्य प्रदूषण भाव प्रदूषण है। जब मन शुद्ध होता है भाव प्रदूषण नहीं होता तो कषाय प्रदूषण लड़ाई झगड़ा युद्ध ग्लोबल वार्मिंग आदि कुछ भी संभव नहीं है। चित्त शुद्धि बिना हीलिंग भी संभव नहीं है। भाव शुद्धि बिना चित्त स्थिर नहीं होगा। जिसके भाव में ख्याति पूजा लाभ की चाह है चित्त शुद्ध नहीं है वह मूर्ख है। चित्त को जीत नहीं सकता तथा ध्यान की चर्चा करता है वह साधु घनाघन पाप करता है।

 सुरा, सुंदरी शिकार आदि के कारण संग्राम होते हैं।

शिकारी प्राणी शेर चीता एनाकोंडा शिकार करने से पहले घंटो तक स्थिर रहते हैं शिकार आने पर पकड़ कर क्रुरता से मारते हैं वह ध्यान नहीं है। मांसाहारी जीव रोज खाते नहीं कुछ सप्ताह के बाद कुछ महीनो के बाद कुछ वर्षों के बाद खाते हैं तो वह उपवास नहीं। कर्म सिद्धांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह चित्त रूपी हाथी इतना प्रबल है कि उसका पराक्रम अनिवार्य है नहीं तो वह संयम रूपी घर को नष्ट कर देगा। चित्त को हाथी की उपमा दी है। हाथी सामान्यतः बुद्धिमान शाकाहारी भद्र सामाजिक प्राणी है तथापि काम वेदना से वह उत्तेजित होकर क्रूर बन जाता है. अन्य क्रूर प्राणियों से भी साठ गुना अधिक क्रूर हो जाता है। हाथी के संभोग के समय हारमोंस स्राव होता है. जिससे मदमस्त हो जाता है उसके मद झरता है। जिसका भाव उदार नहीं, शुभ नहीं वह समस्त पाप करता है। युद्ध, लड़ाई झगड़ा सब पहले भाव से होते हैं वास्तव में वह बाद में होते हैं। धर्म के नाम पर भी क्रुरता असंयम आदि से अधर्म हो रहा है। यह चंचल चित्त रूपी बंदर दौड़ता रहता है। गलत चिंतन करता है दूसरों की निंदा चुगली करके पाप बंध करता है। मन की चंचलता से अधिक पाप बंध होता है। आचार्य श्री यहां पर डाट लगाते हुए कहते हैं जो मन को कंट्रोल नहीं करता वह मूर्ख है वह धर्म की चर्चा करता हुआ लज्जित करता है। वह चित्त को तो जीत नहीं सका तथा ध्यान की चर्चा करता है धर्म की चर्चा करता है, पुण्य,त्याग तपस्या की चर्चा करता है तो वह मूर्ख, निर्लज्ज, ढीठ, पापी है।

बाह्य त्याग अंतरंग त्याग के लिए है। सबसे मुख्य प्रदूषण भाव प्रदूषण है। जब मन शुद्ध होता है भाव प्रदूषण नहीं होता तो कषाय प्रदूषण लड़ाई झगड़ा युद्ध ग्लोबल वार्मिंग आदि कुछ भी संभव नहीं है। चित्त शुद्धि बिना हीलिंग भी संभव नहीं है। भाव शुद्धि बिना चित्त स्थिर नहीं होगा। जिसके भाव में ख्याति पूजा लाभ की चाह है चित्त शुद्ध नहीं है वह मूर्ख है। चित्त को जीत नहीं सकता तथा ध्यान की चर्चा करता है वह साधु घनाघन पाप करता है। सुरा, सुंदरी शिकार आदि के कारण संग्राम होते हैं। शिकारी प्राणी शेर चीता एनाकोंडा शिकार करने से पहले घंटो तक स्थिर रहते हैं शिकार आने पर पकड़ कर क्रुरता से मारते हैं वह ध्यान नहीं है। मांसाहारी जीव रोज खाते नहीं कुछ सप्ताह के बाद कुछ महीनो के बाद कुछ वर्षों के बाद खाते हैं तो वह उपवास नहीं। यह जानकारी

विजय लक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।

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