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भक्ति और उल्लास का महापर्व 22 अप्रैल को मनेगा : चतुर्थ तीर्थंकर भगवान अभिनंदननाथ जी का गर्भ और मोक्ष कल्याणक वैशाख शुक्ल षष्ठी को आता है 


जैन धर्म में तीर्थंकरों के पंचकल्याणक पर्वों का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। यह वे पावन अवसर होते हैं जब तीर्थंकरों के जीवन की प्रमुख घटनाओं का स्मरण कर श्रावक अपने आत्म-कल्याण की भावना भाते हैं। इसी कड़ी में 22 अप्रैल यानी वैशाख शुक्ल षष्ठी का दिन संपूर्ण जैन समाज के लिए बेहद खास और पवित्र है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…


इंदौर। जैन धर्म में तीर्थंकरों के पंचकल्याणक पर्वों का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। यह वे पावन अवसर होते हैं जब तीर्थंकरों के जीवन की प्रमुख घटनाओं का स्मरण कर श्रावक अपने आत्म-कल्याण की भावना भाते हैं। इसी कड़ी में 22 अप्रैल यानी वैशाख शुक्ल षष्ठी का दिन संपूर्ण जैन समाज के लिए बेहद खास और पवित्र है। इस पावन तिथि पर जैन धर्म के चतुर्थ तीर्थंकर भगवान अभिनंदननाथ जी का गर्भ कल्याणक और मोक्ष कल्याणक दोनों एक साथ पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक हर्षाेल्लास के साथ मनाए जाएंगे। इंदौर शहर के विभिन्न दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान की वेदी पर अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, भक्ति, निर्वाण कांड का पाठ और निर्वाण लाडू अर्पित करने सहित कई विधियां और अष्टद्रव्यादि प्रस्तुत किए जाएंगे। पूरे दिन श्रावक-श्राविकाएं भगवान की भक्ति में लीन रहेंगे।

मंदिरों में उमड़ेगा आस्था का सैलाब

इस पावन अवसर पर देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों में उत्सव का माहौल रहता है। मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के दिगंबर जैन मंदिरों और चैत्यालयों से लेकर देश के विभिन्न राज्यों, अंचलों और तीर्थ क्षेत्रों में अपार उत्साह देखने को मिलता है। सुबह की पहली किरण के साथ ही जिनालयों में श्रावक-श्राविकाओं (महिला और पुरुषों) की भारी भीड़ दर्शन और पूजन के लिए उमड़ पड़ती है। धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत भगवान अभिनंदननाथ जी के प्रातःकालीन मंगल अभिषेक और वृहद शांतिधारा से होती है। इसके पश्चात मंत्रोच्चार और भक्ति संगीत के बीच निर्वाण कांड का पाठ किया जाता है। मोक्ष प्राप्ति की पावन भावना को मन में धारण करते हुए वेदियों पर निर्वाण लाडू (जो कि आत्मा की पूर्णता और मोक्ष का प्रतीक है) चढ़ाया जाता है। इस दिन मंदिरों में विशेष विधान, आरती और प्रवचनों का आयोजन होता है, जिससे संपूर्ण वातावरण जिनेंद्र देव की भक्ति से सुवासित हो उठता है।

भगवान अभिनंदननाथ जी के जन्म की रोचक कथा

भगवान अभिनंदननाथ जी जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में चौथे स्थान पर विराजमान हैं। उनके जन्म और नामकरण से जुड़ी एक बेहद रोचक और अलौकिक कथा है। जैन शास्त्रों के अनुसार जब भगवान अभिनंदननाथ जी की आत्मा ने माता सिद्धार्था के गर्भ में प्रवेश किया (गर्भ कल्याणक) तो उनके पिता राजा संवर की नगरी अयोध्या में एक अद्भुत चमत्कार हुआ। तीर्थंकर के प्रभाव से पूरे राज्य में अचानक सुख, शांति और असीम समृद्धि का संचार हो गया। प्रजा के बीच के सभी आपसी बैर-भाव, ईर्ष्या और द्वेष स्वतः ही समाप्त हो गए। हर तरफ केवल हर्ष, उल्लास और एक-दूसरे के प्रति असीम सम्मान की भावना जागृत हो गई। आकाश से देवों ने पुष्प वर्षा की। चारों ओर हो रहे इस अद्भुत ‘अभिनंदन’ (प्रशंसा, स्वागत और आनंद) के माहौल को देखकर ही जन्म के बाद बालक का नाम ‘अभिनंदननाथ’ रखा गया। उनका लांछन (प्रतीक चिह्न) ‘बंदर’ (वानर) है। यह प्रतीक इस बात का गहरा संदेश देता है कि मनुष्य का मन वानर की भांति अत्यंत चंचल है और आध्यात्मिक उन्नति के लिए इस चंचल मन को वश में करना सबसे पहली सीढ़ी है।

जैन समाज और मानवता को दी गई सीख

भगवान अभिनंदननाथ जी ने अपने जीवन, घोर तपस्या और केवलज्ञान के माध्यम से पूरी मानवता को आत्म-शांति का एक शाश्वत मार्ग दिखाया। सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ पर्वत) से मोक्ष प्राप्त करने वाले प्रभु की प्रमुख शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं।

मन और इंद्रियों पर विजय- बाहरी शत्रुओं से लड़ने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण अपने भीतर के विकारोंकृक्रोध, मान, माया और लोभ तथा चंचल मन पर विजय प्राप्त करना है।

अहिंसा और समभाव- उन्होंने सभी छोटे-बड़े जीवों के प्रति दया, करुणा और ‘जियो और जीने दो’ का मार्ग प्रशस्त किया। उनके अनुसार, सच्ची शांति भौतिक वस्तुओं के संचय में नहीं, बल्कि समता भाव में निवास करती है।

अपरिग्रह और त्याग- संसार की नश्वरता को समझाते हुए उन्होंने बताया कि मोह-माया और परिग्रह (आवश्यकता से अधिक संचय) ही दुःखों का मूल कारण है। त्याग का मार्ग ही आत्मा को मोक्ष यानी सच्चे और स्थायी सुख की ओर ले जाता है। 22 अप्रैल को मनाया जाने वाला यह गर्भ और मोक्ष कल्याणक महज एक पूजा-पाठ का दिन नहीं है, बल्कि भगवान अभिनंदननाथ जी के इन महान आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेने का अवसर है। निर्वाण लाडू चढ़ाते समय हर श्रद्धालु के मन में यही प्रार्थना होती है कि प्रभु के बताए मार्ग पर चलकर वे भी एक दिन जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष पद को प्राप्त करें। चतुर्थ तीर्थंकर भगवान अभिनंदननाथ जी के चरणों में कोटि-कोटि नमन!

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