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धर्म, संस्कार, संयम, त्याग, प्रभु की भक्ति से ओतप्रोत हैं भक्त: मुनि श्री सुधासागर जी की धर्मसभा से जाग रही है आध्यात्मिक चेतना


मुनि श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों धर्मसभा में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को अपने प्रबोधन से धर्म, संस्कार, संयम, त्याग, प्रभु की भक्ति आदि के बारे में जाग्रत कर रहे हैं। सोमवार को उन्होंने परिवार से संबंध, प्रभु की भक्ति, परस्पर विश्वास आदि के बारे में बताया। कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…


कटनी। मुनि श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों धर्मसभा में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को अपने प्रबोधन से धर्म, संस्कार, संयम, त्याग, प्रभु की भक्ति आदि के बारे में जाग्रत कर रहे हैं। उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि चले अपन उन दिनों को याद करें जो दिन आनंदमय, सुखमय होते हैं। जिसमें सुकून मिलता है, जिसमें हम अपने आप को पूर्णतः की अनुभूति करते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे मेरे पास सब कुछ है, ऐसे क्षण इस दुनिया में बहुत कम आते हैं क्योंकि, दुनिया का स्वरूप है। तृष्णा निरंतर वृद्धि को प्राप्त होती है, आज तक कोई भी व्यक्ति इस संसार में तृप्त नहीं हो पाया। पता नहीं इस सृष्टि का स्वभाव क्या है, सबकुछ मिल जाता है, फिर भी आगे की चाहत बनी रहती है। पेटभर जाता है लेकिन, खाने की ललक कम नहीं होती। मुझे पत्नी मिल जाए, मेरा बेटा हो जाए, मेरा व्यापार अच्छा चल जाए, ऐसी इच्छा करनें में कोई पाप नहीं है।

मेरी उम्र मेरे बेटे को लग जाए

कैसे माने कि ये हमारा संबंधी है। मां-बेटे का, गुरु- शिष्य का। जब तुम्हारे अंदर तुम्हारी खुद की कमाई, खुद के सुख के दिन, खुद का पसीना जिसे देने का भाव आ जाए, समझ लेना यही हमारा जन्म-जन्म का संबंधी है। मेरी उम्र मेरे बेटे को लग जाए। बस हो गया संबंध और दूसरों की कमाई लेने का भाव आए तो ये डाकू का लक्षण है। डाकू तो दूसरे की संपत्ति पर नियत खराब करता है, तुमने तो बाप की संपत्ति पर नियत खराब की।

पराई वस्तु पर नियत खराब मत करो

महानुभाव कभी चोरी का भाव आ जाए तो सारी दुनिया में डाका डाल लेना लेकिन अपनों के यहां चोरी करने का भाव मत करना। कर्म सिद्धांत कहता है कि तुम बाप की संपत्ति पर नियत खराब नहीं कर सकते, उसको हड़पने का प्रयास मत करो, ये डाकुओं का काम है। नियत खराब होने पर व्यक्ति किसी भी स्तर पर उतर जाता है, इसलिए हम कहते हैं कि किसी पराई वस्तु पर नियत खराब मत करो, चाहे वह बाप की संपत्ति ही क्यों न हो।

अकाट्य विश्वास किसी न किसी बनाकर रखो

कोई भी बुरी घटना या अशुभ घटना घटे तो आपको ये चिंतन करना है, ये दुर्घटना नहीं हुई है। बहुत छोटे में निकल गई है। यदि तुम्हारी श्रद्धा मजबूत है तो कहना उपसर्ग आ ही नहीं सकता, हमारा कुछ बिगड़ ही नहीं सकता, अब इतना विश्वास तुम्हारे पास हो तो बिना णमोकार मंत्र, बिना सिद्धि के आज अभी चमत्कार हो सकता है, नाग का हार बन सकता है, बस विश्वास बताओ, दुनिया में कोई ऐसा व्यक्ति है जिस पर तुम्हारा ऐसा विश्वास हो, कुछ भी घट जाए। हमें पूरा विश्वास है तो आज भी सूली सिंहासन बन सकती है लेकिन, हमें संदेह आता है क्या पता। धर्म क्षेत्र में इतनी श्रद्धा अड़िग रखो कि कहीं गड़बड़ होने का सवाल ही नहीं, ऐसा अकाट्य विश्वास किसी न किसी एक पर बनाकर रखो।

घर पार्टनर शिप की कंपनी है

गृहस्थी पार्टनर शिप की बहुत बड़ी कंपनी है। जो अकेले नहीं चलती पार्टनर शिप चलती ही है। इस कथन से मैं आपको मोटिवेशन दे रहा हूं। यदि कोई घर में बीमार है और उसका एक सदस्य यदि मंदिर जा रहा है, बराबर उसका पुण्य उसके खाते जाएगा क्योंकि, घर पार्टनर शिप की कंपनी है, वह सबका घर है, बस तुम्हें उसके प्रति चाहत होना चाहिए और तुम यह कहो की भक्ति मैं करुंगी लेकिन, पुण्य जाना चाहिए मेरे पति को, कमाई मैं करूँगी और जो पैसा मिले, फलाने खाते में जाना है।

यदि आपने अनुमोदना की है तो…

इस माला में पार्टनरशिप है, घर में एक व्यक्ति पुण्य करता है, अभी सारे घर के लोग उसकी अनुमोदना करें तो वह पुण्य सारे घर को बंटता है, यदि तुम विरोध में गए तो नही। पाप करें तो एक करता है, सारे परिवार को पाप लगता है। यदि आपने अनुमोदना की है तो। जैसे दुकान के बंटवारे में जितने लोगों का हक तो अपने दुकान से एक लाख दान में दिए तो जितने जितने लोगों का हक उसमे है, पुण्य भी उतने ही लोगों के खाते में जाएगा, दिया एक ने है, बस बाकी लोगों को झगड़ा नही करना है।

माला का पुण्य परिवार में बंट रहा

मां मंदिर आई है वो बेटे की मां है, पति की पत्नी है, भाई की बहन है, बहू की सासु है। इन सबका उसके ऊपर कोई न कोई संबंध है, वो माला फेर रही है। इस माला का पुण्य परिवार में बंट रहा है। बस इतनी अनमोदना करना है, मेरी सासू मेरी मां मंदिर गई है, ओहो मैं तो नही जा पाउँगा लेकिन, मां तुझे छूट है, आपने अपना अधिकार दे दिया, पूरे परिवार को पुण्य लगेगा।

अपने हिस्से की भागीदारी खत्म कर लें

चाहे पिता हो, भाई हो या बेटा हो गलत कार्य में अपने अधिकार का प्रयोग करो, आपका अधिकार है तो आपको रोकना ही चाहिए और बेटा तुमने नहीं रोका तो तुमने वह पाप नहीं किया तब भी तुम्हारे खाते में पाप जाएगा। बुरे कार्यों के समय, अपन को कोई भी हो, यदि उसको न रोक सको क्योंकि, वह बड़ा है, बाप है, बड़ा भाई है तो कम से कम विरोध जताकर के अपने हिस्से की भागीदारी खत्म कर लेना चाहिए। अपने से बड़े या छोटी कोई अच्छा कार्य करें तो कभी रोकने का प्रयास मत करना, बल्कि यह कहना क्यों पूछ रहे हो- हमारा ऐसा भी लगा कर आ जाते तो मैं अहोभाग्यशाली हूं।

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