दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -132 मीठे बोल अधूरे हैं जब तक उनके पीछे सच्ची भावना, निष्कलंकता और प्रेम न हो : समाज मीठी वाणी से नहीं, सच्चे स्वभाव से जुड़ता है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 132वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


वाणी से पहले अंत:करण को सुधारो,

मिठास ओढ़ो नहीं, जीवित करो।


कबीर कहते हैं, मीठे बोल मनुष्य को सज्जन प्रतीत कराते हैं, पर केवल वाणी की मिठास से साधक नहीं बनता।

सच्चा साधन वह है जिसमें वाणी, मन और कर्म — तीनों में एकरूपता हो।

जैसे कोई शीशा सुंदर दिखता है, पर अगर उसके पीछे चांदी की परत न हो तो वह प्रतिबिंब नहीं दे सकता,

वैसे ही मीठे बोल अधूरे हैं जब तक उनके पीछे सच्ची भावना, निष्कलंकता और प्रेम न हो।

देशी आरग यानी वह साधारण सुगंध जो जल्दी उड़ जाती है।

कबीर कहते हैं — अगर आपकी वाणी, व्यवहार या साधुता केवल दिखावा है, तो समय उसका पर्दाफाश कर देगा।

वे मनुष्य के व्यवहार में प्राकृतिकता और असलियत की आवश्यकता बताते हैं।

जो व्यक्ति कृत्रिम मिठास दिखाता है, वह नकली इत्र की तरह होता है, जो केवल कुछ क्षणों तक आकर्षित कर पाता है।

वाणी तभी मूल्यवान होती है जब वह अंतरात्मा की प्रतिछाया हो।

साधना केवल बोलने की नहीं, जीने की साधना है।

समाज मीठी वाणी से नहीं, सच्चे स्वभाव से जुड़ता है।

धर्म दिखावे से नहीं, भीतर की शुचिता से ईश्वर मिलता है।

अध्यात्म कृत्रिम नहीं, प्राकृतिक निर्मलता ही साधक की पहचान है।

सच्ची साधना और जीवन की सफलता केवल मधुर बोलने में नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई और स्थिरता में है।

जो केवल दिखावे की मिठास है, वह समय की कसौटी पर फीकी पड़ जाती है।

मीठा बोलना अच्छा है, पर उसमें सत्य, श्रद्धा और आत्मिक गहराई होनी चाहिए।

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