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धर्म से बड़ी हमारी जिंदगी भर की धारणा नहीं हो सकती : निर्यापक मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज


निर्यापक मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि व्यक्ति पूरी जिंदगी संसार की व्यवस्था में, संसार की जोड़ तोड़ में निकालकर के अपनी जिंदगी का अवसान कर लेता है। हमें कीचड़ में रहना है लेकिन पंक नहीं बनना, हमें बनना है पंकज बनना है। पढ़िए राजीव सिंघई की रिपोर्ट…


व्यक्ति पूरी जिंदगी संसार की व्यवस्था में, संसार की जोड़ तोड़ में निकालकर के अपनी जिंदगी का अवसान कर लेता है। हमें कीचड़ में रहना है लेकिन पंक नहीं बनना, हमें बनना है पंकज, पापियों के बीच में रहकर हम पापी नहीं बनेंगे। संसार ने अपने रास्ते सर्किल रूप बनाए हैं, सर्किल का अर्थ है वही-वही घूमते जाओ, कोल्हू के बैल के समान सबकुछ वही है।

स्पष्ट है कि मेरा बेटा खुरापाती है फिर भी जब पक्ष की बात आएगी तो किस तरफ झुकोगे? कौन झुका रहा है, अनजाने की नहीं कह रहा हूँ, अनजाने की तो अपने असत्य भी सत्य है। यदि अनजाने में हम असत्य को सत्य मानते रहे तो तुम्हे असत्य का दोष नहीं लगेगा। इमली का पेड़ है और किसी कारणवश मानते रहे कि यह नीम का पेड़ है तो कोई दोष नहीं, लेकिन जिस दिन किसी विज्ञ व्यक्ति के द्वारा पता चल जाए यह तो इमली का पेड़ है लेकिन मन में भाव आ जाए कि आज तक माना है तो अब कैसे, अब तो नीम है तो है बस उसी समय तुम मिथ्यादृष्टि हो गए।

अपन इतने मूर्ख नहीं है कि अपन सत्य को नहीं जानते, दिन को दिन, रात को रात और पाप को पाप नहीं जानते, दसो धर्म हम जानते है, सब जानते है। विभीषण बचपन से ही रावण का प्रिय भाई था और सारे युद्ध रावण ने विभीषण की अगवानी में लड़े, हर युद्ध में विभीषण सेनापति होता था लेकिन जब विभीषण को पता चला कि मेरा भाई असत्य के पक्ष में है, क्या किया, रावण को समझाया, लात भी खाई लेकिन कहा नहीं, धर्म से बड़ा भाई नहीं हो सकता, धर्म से बड़ा मोह, परिवार नही हो सकता। धर्म से बड़ी हमारी जिंदगी भर की धारणा नही हो सकती। हमने कहा इसको जिंदगी भर नीम का पेड़ लेकिन आज सही पता चला तो अब नही। इस संसार के स्वरूप को तुम समझों, समझ रहे हो, जान रहे हो लेकिन एक साहस करो असत्य को ठुकराने का, कम से कम इतनी घोषणा तो कर ही दो कि मैं आज तक जिंदगी में जो किया, वह झूठा है और आज जो गुरु ने सुनाया वही सत्य है। इतनी भी अपने घोषणा कर दी तो भले आप चाहे चारित्री बन पाओ या न बन पाओ लेकिन सम्यकदृष्टि तो बन ही जाओगे।

जिनसे तुम दिन रात मोह कर रहे हो, 60 साल के बाद वे तुम्हारे नहीं है। एक माँ बनने के बाद भारतीय नारी का पक्ष पति से ज्यादा बेटे की ओर जाता है, मनुष्य में ही नही तिर्यंचों में भी। आज तक कोई नारी, पुरुष तिर्यंच के लिए नही मरी लेकिन आज एक मृगी अपने बेटे के लिए शेर के सामने कूंद जाती है, मातृत्वपना नारी का स्वभाव नही है, पत्नीत्व नही। 80 साल के बाद तुम धर्म करना भी चाहोगे तो नही होगा, बुद्धि, विवेक काम नही करेगा, जिन्होंने जिंदगी भर रात में नही खाया लेकिन 80 साल के बाद रात में भी मांगने लग जाते है। अपन को लग रहा है कि हम बड़े होते जा रहे है, असल मे छोटे होते जा रहे है, इसलिए जो करना है, 40 के पहले जल्दी कर लो, बाद का हाल तो सब देख ही रहे है।

तुम इस संसार में सत्य को पहचानो और समझ में आ जाए तो 40 साल तक भले न समझ बने रहना, 40 साल तक मोह मायाजाल में फंसे रहना, 40 साल तक तुम मौज मस्ती करते रहना लेकिन 41 में प्रवेश के पहले पहले सत्य का निर्णय कर लेना और 60 साल में तो आयु बन्ध का समय है कोई साथ नहीं देगा, 60 साल के बाद भी जिनके लिए तो मर रहे हो, जिनके लिए तुम धर्म छोड़ रहे हो, पाप कर रहे, तुम जान रहे हो कि सत्य कैसा है, ये गलत है फिर भी कषायों के पक्ष में तुम्हारा मन जा रहा है, मत करो अब आयु बंध का समय आ गया है, अंत में तुम्हारे साथ रहेंगे वही कर्म, जो तुमने किया था।

कायदे से 40 साल की तुम्हे जिंदगी मिली है, 40 साल तक की कमाई तुम्हें जहां उड़ाना है उड़ाओ क्योंकि वो तुम्हारी ओरिजिनल जिंदगी है बस 40 साल के बाद की कमाई पाप के लिए नही, धर्म के लिए नहीं, संसार के लिए नहीं। 40 साल के बाद जो कुछ भी कमाओगे अपने लिए कमाओगे, अपने धर्म के लिए कमाओगे। गलत कार्य मे नही, अच्छे कार्य मे जायेगे, हम परिवार के विकास में लगाएंगे, परिवार को अच्छा रास्ता, अच्छी जिंदगी, सत्मार्ग में लगायेंगे। फिर हम पुण्यहीनों के लिए कुछ देगे, मानव सेवा, गौसेवा करेंगे। तीन में ही धन जाना चाहिए 40 के बाद- पहला परिवार व अपने धर्म के लिए, दूसरा पुण्यहीनों के लिए, पशु पक्षियों के लिए, तीसरा मानव जाति के लिए। 40 साल के बाद ऐसा कोई काम नहीं करना जो जाति विरुद्ध, कुल विरुद्ध, माँ बाप के विरुद्ध, गुरुओं के विरुद्ध हो, धर्म के विरुद्ध हो।

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