राजा का बल, कितनी बड़ी सेना, राज्य की सीमाओं से अंदाज़ा लगाया जाता है यह कितना शक्तिशाली है। ऐसे ही जब करोड़ों देवता जिनका जन्म कल्याणक मनाने आते हैं वे तीर्थ के कर्ता कहलाते हैं। यह उद्गार सुभाषगंज मैदान में विशाल धर्मसभा में मुनि श्री सुधा सागरजी ने व्यक्त किए। अशोकनगर से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…
अशोक नगर। राजा का बल, कितनी बड़ी सेना, राज्य की सीमाओं से अंदाज़ा लगाया जाता है यह कितना शक्तिशाली है। ऐसे ही जब करोड़ों देवता जिनका जन्म कल्याणक मनाने आते हैं वे तीर्थ के कर्ता कहलाते हैं। यह उद्गार सुभाषगंज मैदान में विशाल धर्मसभा में मुनि श्री सुधा सागरजी ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हर छः महीने आठ समय में छः सौ आठ जीव भगवान बन रहे हैं। 608 जीव भगवान बन रहे हैं तो आप 608 के नाम पता करो उनकी माला फेरों उनकी जाप देना। एक-एक को नमस्कार करो। इतना सबकुछ आप नहीं कर सकते। इसलिए तो ये वीआईंपी व्यवस्था बनाई, वैसे तो घट-घट में भगवान बैठा है बेटे के घट में भगवान है तो क्या बाप उसकी पूजा करने लगे। उसी समय बेटे को शू-शू आ गई तब आप क्या करेंगे। जैन दर्शन में कहा कि प्रत्येक आत्मा भगवान आत्मा है। वैष्णव दर्शन में भी घट-घट में भगवान माना गया। सब धर्म मानते हैं लेकिन व्यवहार नहीं बनेगा। आप की पत्नी की आत्मा में भी भगवान है तो क्या आप उसकी पूजा करेंगे।
पंच कल्याणक महोत्सव के कार्यकर्ताओ का होगा सम्मान
जैन समाज के मंत्री विजय धुर्रा ने कहा कि सोमवार को मुनि श्री सुधासागरजी के सान्निध्य में श्री मद् जिनेन्द्र पंच कल्याणक महोत्सव एवं विश्व शांति महायज्ञ एवं चातुर्मास में कार्य करने वाले सभी संगठनों व महिला मंडलों के श्री दिगम्बर जैन पंचायत कमेटी के अध्यक्ष राकेश कासंल महामंत्री राकेश अमरोद कोषाध्यक्ष सुनील अखाई के नेतृत्व में सम्मान किया गया।
शिविर का उद्घाटन समारोह हुआ
श्रमण संस्कृति बाल संस्कार शिविर का हुआ शुभारंभ
मुनिश्री सुधासागरजी ससंघ के सान्निध्य में रविवार को ध्वजारोहण के साथ श्रमण संस्कृति शिविर शुभारंभ किया गया। मुनिश्री ने कहा कि प्रकृति अपना रूप बदलती है। कभी ये अपना रूप भाग्य के अधीन कभी कर्म के अधीन कर देती है। कभी भाग्य के अधीन होने पर आप कर्म की कठपुतली बनकर रह जाएगा। वहीं दूसरा कर्म करके अपना रास्ता बनने वाले कर्म युग में पैदा हुए किस्मत से धर्म नहीं चलता कर्म से धर्म चलता है। श्रमण संस्कृति कर्म से चलती है इसके साथ भाग्य भरोसे चलने वाले भी हैं। आज श्रमण संस्कृति को समझने वाले हैं।













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