खंडवा के नवकार नगर स्थित मुनिसुव्रतनाथ जिनालय में आर्यिका लक्ष्मीभूषण माताजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए श्रद्धा और भक्ति के महत्व पर प्रेरक उद्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि श्रद्धा के बिना भक्ति पूर्ण नहीं हो सकती। पढ़िए श्रीफल साथी सन्मति जैन काका की यह रिपोर्ट।
खंडवा/सनावद। आचार्य सन्मति सागर जी (बड़ागांव वाले) की शिष्या आर्यिका लक्ष्मीभूषण माताजी इन दिनों नवकार नगर स्थित मुनिसुव्रतनाथ जिनालय में विराजमान हैं। उनके सान्निध्य में प्रतिदिन धर्मसभा, प्रवचन और स्वाध्याय के माध्यम से धर्म की गंगा प्रवाहित हो रही है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।
श्रद्धा और भक्ति का संबंध
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आर्यिका लक्ष्मीभूषण माताजी ने कहा कि किसी महान व्यक्तित्व के गुणों और उपलब्धियों के प्रति मन में सम्मान का भाव उत्पन्न होना श्रद्धा है, जबकि ईश्वर और गुरु के प्रति प्रेम, समर्पण एवं अपनत्व का भाव भक्ति है। उन्होंने कहा कि श्रद्धा के बिना भक्ति अधूरी होती है और श्रद्धा के साथ की गई प्रभु भक्ति विशेष फलदायी होती है।
पार्श्वनाथ स्तोत्र का महत्व बताया
माताजी ने पार्श्वनाथ स्तोत्र के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि श्रद्धा और भक्ति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। श्रद्धा वृक्ष की जड़ के समान है और भक्ति उस पर खिलने वाले सुंदर पुष्प हैं। जैसे वर्षा की बूंदें तालाब को भर देती हैं, वैसे ही तीर्थंकरों के गुण मन में श्रद्धा का संचार करते हैं।
नियमित प्रवचन और स्वाध्याय
सकल दिगंबर जैन मुनि सेवा ट्रस्ट के अविनाश जैन ने बताया कि आर्यिका श्री ने मलकापुर में दो माह की ग्रीष्मकालीन वाचना पूर्ण करने के बाद मुक्तईनगर और बुरहानपुर से पदविहार करते हुए खंडवा में मंगल प्रवेश किया। प्रतिदिन प्रातः 7:30 बजे प्रवचन, 9:30 बजे आहारचर्या तथा रात्रि 7:30 बजे ब्रह्मचारिणी रिम्पी दीदी द्वारा रयणसार ग्रंथ पर स्वाध्याय कराया जा रहा है।
धर्मसभा में श्रद्धालुओं की सहभागिता
कार्यक्रम के प्रारंभ में मंगलाचरण श्रीमती संतोष बैनाड़ा ने किया। गणाचार्य विरागसागर जी के चित्र के समक्ष राजेंद्र छाबड़ा एवं प्रकाशचंद जैन ने दीप प्रज्ज्वलित किया। प्रारंभिक दो दिनों की आहारचर्या का सौभाग्य श्रीमती वंदना-अविनाश जैन परिवार तथा कु. अवनि एवं कु. इनिका जैन परिवार को प्राप्त हुआ। कार्यक्रम का संचालन अविनाश जैन ने किया।













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