समाचार

गणधर महामंत्र विलय के 11वें महामंत्र पर प्रवचन : कषाय व मिथ्यात्व से बचें, प्रमाद न करें, सम्यकत्व का पालन करें – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज


1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में गणधर महामंत्र विलय के 11वें दिन णमो पत्तेय-बुद्धाणं मंत्र का व्याख्यान करते हुए अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर ने कहा कि इस मंत्र की साधना से प्रतिवादी विद्या का नाश होता है। पढ़िए एक रिपोर्ट…


इंदौर। 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में गणधर महामंत्र विलय के 11वें दिन णमो पत्तेय-बुद्धाणं मंत्र का व्याख्यान करते हुए अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर ने कहा कि इस मंत्र की साधना से प्रतिवादी विद्या का नाश होता है। उपदेश के बिना जिस शक्ति के द्वारा ज्ञान, संयम, तप विधान का विशेष ज्ञान हो जाता है। ऐसी बुद्दि प्राप्त करने के लिए हमें जिनों की आराधना करनी चाहिए। ऐसे जिनों को नमस्कार करना चाहिए। कर्मों के उपशम से सम्यक ज्ञान व तप में वृद्धि होती है। यहां वर्तमान समय में भले ही गुरु का उपदेश नहीं मिला हो, लेकिन किसी न किसी भव में गुरु का उपदेश मिला था उसी के अनुसार शुभ कर्म के उदय के कारण ही हमें बिना गुरु के उपदेश के ही हमें शक्तियां, ज्ञान व संयम प्राप्त हो जाता है। इस सब में पुण्य कर्म का मुख्य कारण भी है। वर्तमान में कषाय, प्रमाद ,मिथ्यात्व का त्याग होना चाहिए। व्रतों का पालन करना चाहिए । मन वचन काय को संभाल कर रखना चाहिए तभी हम शुभ कर्म का बंध कर सकते हैं। उससे हमें पुण्य की प्राप्ति होगी वही पुण्य हमें अगले भव में काम आता है। कषाय के कारण पिता-पुत्र, पति-पत्नी में झगड़े हो जाते हैं। हम मनुष्य कुल के होते हुए भी राक्षण का रूप धारण कर लेते हैं।

जीवन में बनाएं नियम 

हमें जीवन में छोटे-छोटे नियमों को धारण करना चाहिए। इनसे हम अपने जीवन की दिशा बदल सकते हैं। छोटे-छोटे व्रत एक दिन महाव्रत के रूप में तब्दील हो जाते हैं। मुनिश्री ने प्रमाद के बारे में बताया कि छोटे-छोटे प्रमाद के कारण हमें धर्म की क्रियाएं छोड़ देते हैं। आज नहीं, कल कर लूंगा और हमारा मन अशुभ क्रिया में लग जाता है।शुभ कर्म का बंध नहीं होता और पुराने कर्म की निर्जरा भी नहीं होती।

मन, वचन व काय की चंचलता भी बड़ा विषय है। इनकी वजह से भी हमारा कर्म का बंध होता है। धार्मिक अनुष्ठान करते हैं तो मन कहीं चला जाता है और वचन कहीं। इन सभी बातों पर विचार करना चाहिए। कषाय से बचें, प्रमाद न करें, मिथ्यात्व से बचें,व्रतों का पालन करें । सम्यकत्व का पालन करते हैं, व योग को अवस्थित रखते हैं तो हमारे जीवन में शुभ कर्मों का बंध होगा।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
1
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page