पिच्छी बनाने के लिए उन्हीं मोर के पंखों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें मोर स्वतः (प्राकृतिक रूप से) छोड़ देते हैं। दिगंबर परंपरा में पिच्छी मुनि के 28 मूल गुणों और संयम का आवश्यक अंग है। इसके बिना कोई भी मुनिराज विचरण नहीं कर सकते। कोल्हापुर से अभिषेक अशोक पाटिल का यह आलेख पढ़िए,
कोल्हापुर। पिच्छी बनाने के लिए उन्हीं मोर के पंखों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें मोर स्वतः (प्राकृतिक रूप से) छोड़ देते हैं। दिगंबर परंपरा में पिच्छी मुनि के 28 मूल गुणों और संयम का आवश्यक अंग है। इसके बिना कोई भी मुनिराज विचरण नहीं कर सकते। पिच्छी मुख्य रूप से दिगंबर जैन साधु और साध्वियों द्वारा रखा जाने वाला एक धार्मिक और संयम का उपकरण है। पिच्छी अहिंसा और करुणा का प्रतीक है। जब मुनिराज या माताजी कहीं बैठते या चलते हैं तो वे इसके द्वारा उस स्थान को धीरे से साफ करते हैं, ताकि अनजाने में कोई छोटे जीव उनके नीचे आकर दब न जाए। पिच्छी बनाने के लिए उन्हीं मोर के पंखों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें मोर स्वतः (प्राकृतिक रूप से) छोड़ देते हैं, इसलिए इसमें किसी भी जीव की हिंसा नहीं होती। मोर पंखों की यह विशेषता होती है कि इन पर धूल और पसीना नहीं चिपकता। ये अत्यंत कोमल और हल्के होते हैं, जिससे किसी जीव को कोई चोट नहीं पहुंचती। चातुर्मास के पश्चात या जब पिच्छी के पंखों की कोमलता कम होने लगती है तो गुरु परंपरा के अनुसार विधि-विधान से ‘पिच्छी परिवर्तन’ किया जाता है।













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