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निर्ग्रन्थ राम, जैन संस्कृति में राम, मोक्षगामी राम : राम नवमी पर विशेष आलेख


भगवान राम यूं तो कण-कण मेंऔर हर मन में विद्यमान है। कई लोग तो दिनभर राम नाम की धुन ही लगाए रहते हैं। राम-राम, जय जय राम जी की ,जय सियाराम से ही दिन का प्रारम्भ और अंत होता है। राम नवमी पर पुष्पा क्रान्ति पांड्या का आलेख पढ़िए…


भगवान राम यूं तो कण-कण मेंऔर हर मन में विद्यमान है। कई लोग तो दिनभर राम नाम की धुन ही लगाए रहते हैं। राम-राम, जय जय राम जी की ,जय सियाराम से ही दिन का प्रारम्भ और अंत होता है। जो जीवनभर राम नाम का ध्यान कर ले वह स्वय राम हो सकता है।राम जीवन में हर समय एक प्रेरणा देते हैं राह दिखाते हैं। कहीं किसी को उनकी बालपन की अठखेलियाँ या बजती पेंजनियाँ मोहित करती हैं तो किसी को युवा राम की मातृ प्रेम,पितृभक्ति- वनवास गृहत्याग, आदि। वैसे तो उनके इन सभी रूप में निर्विकारता, निर्विकल्पता दिखाई देती है। फिर भी जनमानस मै वे मर्यादा पुरुषोत्तम राम या राजाराम के रूप में ही पहचाने गये इन सबसे हटकर एक

महान राम का जो हमें जैन संस्कृति में देखने को मिल‌ ता है वह हे “निग्रन्यराम “’यहाँ राम को पद्‌ म नामसे भी-जाना गया है। अत: उनपर आधारित ग्रन्यका -नाम” पद्‌ मपुराण” है। जिसमें उनके समकालीन २० वें तीर्थकर

-मुनिसुव्रतनाथजी-व रामायण- के सभी पात्रो का उल्लेख है।

तप और त्याग आधारित जैन संस्कृति में तीर्थकर तो २४ ही होते हैं। पर भगवान अनेकों। जिन्होंने राग देषादि

विकारों का त्याग कर आठो कर्मों का नाशंकर सर्वज्ञ हुए सिद्धत्व को प्राप्त किया-वे सभी पूजनीय है। ऐसे सभी

मोक्षगामी जीव जिनमें रामायण के अनेक पात्र जो भगवान है जिन्हें ‘निर्वाण कांड “ पाठ में प्रतिदिन श्रद्धा पूर्वक

नमन किया जाता है। उनमें से भगवान रामचन्द्रजी, हनुमानजी, सुग्रीव, सुडील, गवय, गवाक्ष्य, नील और महानील

आदि है जो मांगीतुंगी जी सिद्ध क्षेत्र महाराष्ट्र से मोक्ष गए ।लव-कुश पावागढ़ गुजरात ‌ से ,रावण के पुत्र

आदिकुमार रेवालट सिद्धवरकूट से, इंद्रजीत और कुम्भकर्ण बावनगजा मध्य प्रदेश से तथा बालि महाबाली मुनिराज अष्टापद से मोक्ष गये।

रामचन्द्रजी के जीवन चरित्र से तो सभी परिचित हैं परन्तु वे विशिष्ट त्रेसठ शलाका पुरुषों में से एक आठवें बलभद्र थे । और आत्म साधना कर उन्होंने परमात्मपद को प्राप्त किया।

रामचंद्र जी के जन्म से पूर्व महारानी कोशल्या ने रात्रि के अंतिम प्रहर में चार अद्भुत स्वप्न देखे – सफेद हाथी ,

सिंह,सूर्य, और सर्व कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा । प्रात: कोशल्या जी ने राजा दशरथ जी को स्वप्न वृतान्त सुनाकर

स्वप्न फल जानना चाहा । तो उन्होंने कहा कि हे महारानी आपके परम आश्चर्यकारी मोक्षगामी पुत्र होगा जो

अंतर्बाह्य शत्रुओं का विजेता होगा ।

रामचंद्र जी के जन्म पर राजा दशरथ ने बहुत उत्सव किया, याचको को दान दिया । बालक का वर्ण उगते सूर्य के समान था, नेत्र कमल के समान थे और वक्षस्थल लक्ष्मी से आलिंगित था, अत: उनका नाम “पद्म “ रखा गया ।

वन वास के समय घूमते हुए रामचन्द्र जी वंशस्थ धुती नामक नगर के समीप पहुँचे । पर्वत पर कुलभूषण और

देशभूषण-मुनिराजों के दर्शन- करते हैं। वहाँ अग्निजय देव व्दारा किये गये, उपसर्ग को दूर किया। मुनिराजों को केवलझान प्राप्ति हुई ।तब उन्होंने कहा-हे राम तुम चरम शरीरी हो, तदभव मोक्ष गामी हो । प्राणी के बैर का कारण सर्व बेरानुबंध है । अत:राग द्वेष तज निश्चल हो । कनर्नवा नदी के तट पर दण्डक वन में गुप्ति व सुगुप्ति नामक दो चारण ऋद्धि धारी मुनिराजों को जो दो मासोपवासी थे, राम लक्ष्मण व सीता जी ने भक्ति पूर्वक श्रद्धा सहित फल, दाख ,छुहारे व दूध आदि से आहार दिया ।

रावण की मृत्यु के पश्चात इंद्रजीत, कुंभ कर्ण और मेघनाथ राम जी की शरण मे आये तब कई विद्याधर कहने लगे कि ये शत्रु हैं इन्हें छोड़िये नहीं किंतु राम जी ने कहा कि ये क्षत्रिय धर्म नहीं है । सोते हुए को, हारे हुए को, डरे हुए को, शरणागत को, बालक को, वृद्ध को व स्त्रियों का हरण नहीं करना चाहिए । बल्कि उन्होंने कहा कि ये पूर्व की भांति भोगरूप राजपरिवार की तरह ही रहेंगे ।मगर इंद्र जीत और कुंभ कर्ण ने भोगसंपदा को विष समान समझ धर्म को ही जीवन का सार मानकर जिन दीक्षा ग्रहण की और बावन गजा मध्य प्रदेश से मोक्षगामी हुए ।

राम जी के अयोध्या पहुचने पर वहाँ कुलभूषण और देशभूषण केवली का आगमन हुआ । संसार से सदा विरक्त रहने वाले भरत जी ने मुनिराज से अपना पूर्व भव सुन कर जिन दीक्षा धारण की और माता केकेई ने भी आर्यिका दीक्षा ले ली। सीता जी को अपनी निर्दोषिता साबित करने के लिए अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है । वे पंच परमेष्ठी का ध्यान कर अग्नि कुंड में प्रवेश करती हैं और अग्नि जल रुप में परिवर्तित हो जाती है ।कुंड कमल बन जाता है ।मगर सीता जी संसार से विरक्त होकर आर्यिका पृथ्वीमति माता जी सें दीक्षा लेकर बाँसठ वर्ष तक तपस्या कर सल्लेखना ले लेती हैं। जिससे अच्युत स्वर्ग को प्राप्त करती है । भाई लक्ष्मण की मृत्यु से दुखी राम जी विचार करते हैं कि किसका भाई, कौन पुत्र, परिवार, धन संपदा सब असार है ।और तीर्थंकर मुनिसुवृत नाथ जी के बताए मार्ग का अनुसरण करते हुए चारण ऋद्धि धारी सुव्रत मुनि राज से दीक्षा ग्रहण कर लेते हैं ।उनके साथ नल, नील, शत्रुध्न आदि ने भी दीक्षा ले ली। पंचोपवास के बाद जब रामचन्द्र जी नंदस्थली नगरी में पारना के लिए आए तो राजा ने महल के उपर से ही देख सामंतों को उन्हें बुलाने भेजा। सामंत उनके चरणों में गिर कर राजा के यहा ही भोजन करने की जिद करने लगे जिसे अन्तराय मानकर रामचंद्र मुनिराज वापस लौट गए। तब राजा प्रतिनंदी और पट्ट रानी प्रभवा ने उन्हें जंगल में ही विधि पूर्वक आहार दिया। निरन्त्र राय आहार होने पर पंचाश्चर्य हुए। वे अक्षीण ऋद्धि के धारी थे अत: उस दिन रसोई का अन्न अटूट हो गया। माघ शुक्ल द्वादशी की रात्रि में उन्हें केवल ज्ञान प्राप्त हुआ । दिव्य ध्वनि खिरी- राग आदि का अभाव होकर आत्मा का शुद्ध होना ही धर्म है ।आत्म स्वभाव में श्रद्धा करना सम्यक् दर्शन, अनुभव करना सम्यक् ज्ञान व आत्म स्वभाव में लीन होना सम्यक् चारित्र है ।इन तीनों की साधना एकता ही मोक्ष मार्ग है। अपने केवल्य काल के सात वर्षों में दिव्य देशना द्वारा भव्य जीओ के लिए स्वकल्याण का मार्ग प्रशस्त कर अंत में माँगी तूँगी के तुंगीगिरी पर्वत से योग निरोध कर चौदहवे गुणस्थान में पहुँचे और चार अधातिया कर्मों का नाश कर सिद्ध अवस्था को प्राप्त किया।

“पद्म पुराण” और “आध्यात्म योगी राम “से संकलित

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