प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी की मूल बालब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 36 साधुओं सहित (37 पिच्छी) का दीक्षा गुरु आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज की समाधि स्थली सीकर के दर्शन, वंदना के लिए मंगल विहार चल रहा है। मंढ़ा सुरेरा से पढ़िए, डॉ. राजेश पंचोलिया की यह रिपोर्ट…
मंढा सुरेरा। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी की मूल बालब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 36 साधुओं सहित (37 पिच्छी) का दीक्षा गुरु आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज की समाधि स्थली सीकर के दर्शन, वंदना के लिए मंगल विहार चल रहा है। रविवार को अनेक श्रद्धालुओं के सामने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, मुनि श्री हितेंद्र सागर जी, आर्यिका श्री दर्शनामति, आर्यिका श्री निर्माेह मति ने आषाढ़ मास कृष्ण पक्ष पंचमी को मंढा सुरेरा जिला सीकर में प्रवास के दौरान केशलोचन किया।
केशलोच दिगंबर साधु का मूल गुण
केशलोचन के बारे में संघ की आर्यिका श्री महायशमति जी ने चर्चा में बताया कि प्रत्येक दिगंबर साधु को 2 माह से 4 माह की अवधि के भीतर के केशलोचन करना अनिवार्य है । केशलोच दिगंबर साधु का मूल गुण है। केशलोचन के माध्यम से शरीर से राग और मोह दूर होता है। केश लोचन की प्रक्रिया में आर्यिका श्री ने बताया कि केशलोचन करते समय केवल राख का उपयोग किया जाता। जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है। बालों का लोचन अगर नहीं किए जाएं तो उसमें छोटे-छोटे जीवों की उत्पत्ति होने की संभावना होती है। जैन साधु अहिंसा धर्म के महाव्रती होते हैं।
तप, संयम, धैर्य के साथ धर्म की प्रभावना
बाल हाथों से इसलिए उखाड़े जाते हैं कि बालों को कटिंग करने के लिए सेविंग कराने के लिए अन्य द्रव्य की आवश्यकता होती है। हितेश रारा के अनुसार माताजी ने बताया कि जैन साधु अपरिग्रही होते हैं। इसलिए जैन साधु अपने हाथ से केशलोचन करते हैं बाल सौंदर्य का प्रतीक हैं। इससे राग और आकर्षण होता है। केश लोच से शरीर से ममत्व दूर होता है। केश लोचन के समय तप, संयम, धैर्य के साथ धर्म की प्रभावना होती है।
केशलोच तपस्या की अनुमोदना की
जिस दिन जैन साधु केशलोच करते हैं। उस दिन उपवास करते हैं। केश लोचन देखकर अनुमोदना करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। कर्मों की निर्जरा होती है। इस अवसर पर अनेक समाज जन उपस्थित रहे। अनेक महिलाओं ने वैराग्य पूर्ण भजन गा कर केशलोचन की तपस्या की अनुमोदना की।













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